झुठलर
हमारी हिंदी पत्रकारिता ही विश्वगुरु है, कयोंकि इस ने सब कुछ पहले से तै कर लिया है कि उसे क्या लिखना है۔
पाकिस्तान की चार दिन की यात्रा पर आए संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस से जब एक इंटरव्यू में पूछा गया कि क्या वो भारत में नए कानून 'नागरिकता (संशोधन) अधिनियम' (CAA) को लेकर चिंतित हैं तो उन्होंने कहा, 'जाहिर तौर पर हूं। क्योंकि यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें संयुक्त राष्ट्र की संबंधित इकाई बहुत सक्रिय है।' उन्होंने कहा, 'शरणार्थियों के लिए वर्तमान उच्चायुक्त इस स्थिति को लेकर काफी सक्रिय हैं। क्योंकि इस तरह के कानून से नागरिकता जाने का खतरा पैदा होता है।'
दुनिया के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय संगठन के महासचिव के इस बयान पर नवभारत टाइम्स सुर्खी लगाता है,'CAA पर UN चीफ एंतोनियो गुतारेस का बेतुका बयान, बोले- नागरिकता जाने के खतरे पर रोक जरूरी'.https://navbharattimes.indiatimes.com/world/pakistan/necessary-to-prevent-statelessness-when-nationality-laws-are-changed-says-un-chief/articleshow/74210717.cms
आज के जो हालात हैं या आगे जो भी बनेंगे उनके लिए हिंदी पत्रकारिता (टीवी जैसे ज़ी न्यूज़, आज तक, इंडिया न्यूज़, अख़बार जैसे दैनिक जागरण, अमर उजाला और NBT) 60 फीसद ज़िम्मेदार हैं. ये वो घाघ हैं जिनकी पत्रकारिता से ज़ाहिर होता है कि वो कभी भी भारत को गाँधी के सपनों का राष्ट्र नहीं बनने देंगे.
#SupremeCourt
पिछले दो दिनों से सुप्रीम कोर्ट की तरफ से नियुक्त मध्यस्थ (Mediators) साधना रामचंद्रन और संजय हेगड़े शहीनबाग की महिला प्रदर्शनकारियों से बात कर रहे हैं. Mediators उन्हें समझा रहे हैं कि जिस तरह आपका प्रदर्शन करने का हक़ है उसी तरह अन्य शहरियों को भी यहाँ से आने जाने का हक़ है.
दूसरी तरफ प्रदर्शन करने वाली महिलाएं कह रही हैं कि हम जिन मुद्दों पर यहाँ बैठे हैं उनकी किसी को फ़िक्र नहीं, हर किसी को बस सड़क की पड़ी है.
Mediators आज फिर शहीनबाग पहुंचे. संजय हेगड़े ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के लिए बहुत आसान था कि वो पुलिस को बोल कर आप को हटवा दे लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. वो भी आपकी बात समझता है. It's my way or highway नहीं होता. शाहीनबाग हो या और कोई जगह अगर लोगों को तकलीफ़ है तो Protest होना चाहिए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट कहता है कि कल को अगर नोएडा वाले डीएनडी जाम करके बैठ जाएं तो इस तरह से देश नहीं चलेगा. सुप्रीम कोर्ट भी समझता है कि छोटे से कोर्ट रूम में सबको नहीं सुना जा सकता, इसीलिए हमें भेजा गया.
उन्होंने कहा कि आपके हाथ में इतिहास है, आपके हाथ में फ़ैसला है. जहां औरतों का बोलबाला होता है... वही देश आगे बढ़ता है. आपसे गुजारिश है कि आप ये बताइए कि आगे मामला कैसे बढ़ सकता है?
उन्होंने कहा कि आपके हाथ में इतिहास है, आपके हाथ में फ़ैसला है. जहां औरतों का बोलबाला होता है... वही देश आगे बढ़ता है. आपसे गुजारिश है कि आप ये बताइए कि आगे मामला कैसे बढ़ सकता है?
मेरे ख्याल में सुप्रीम कोर्ट 21वीं शताब्दी में बैलगाड़ी की सवारी कर रहा है. सीधी सी बात है, देश चलाने की ज़िम्मेदारी सरकार की है. सुप्रीम कोर्ट का काम नागरिक के अधिकारों (संविधान) की रक्षा करना है, न्यायपालिका चलाना है. अगर इतना ही ज़रूरी है तो वो पहले डे टू डे हेयरिंग शुरू करके CAA पर अपना फैसला सुनाये.
2014 से पहले सुप्रीम कोर्ट काफी सो मोटो नोटिस लिया करता था मगर अब...कम से कम पहले कोई भी मामला सुप्रीम कोर्ट जाता था तो जब तक फैसला न हो जाए स्टे लग जाया करता था मगर अब...चाहे वो आर्टिकल 370 हो या फिलहाल एनपीआर, CAA या एनआरसी का मामला हो... कहीं भी ऐसा कुछ नज़र नहीं आया! सुप्रीम कोर्ट ने ही NRC के मामले में अपने एक आदेश में बर्डेन ऑफ प्रूफ़ सरकार से हटा कर जनता पर डाल दिया था. स्टेट बनाम सिटिज़न की लड़ाई में ये ऐसा ही हो गया कि ' एक तो करेला दूसरा नीम पर चढ़ा.'
सुप्रीम कोर्ट पर बड़े संगीन सवाल खड़े किये जा चुके हैं. फिलहाल उसका रवैया समझ से बाहर है, अगर उसे अपनी साख की कुछ परवाह है तो ये उसे अपने कर्तव्य से साबित करना चाहिए.
शहीनबाग आंदोलन शुरू हुए आज 68 दिन हो गए. सरकार या उनका कोई नुमाइंदा उनसे बात करने तक नहीं गया. सरकार के रवैये से ये प्रतीत हो रहा है कि ये सभी भारतीय है ही नहीं.
शहीनबाग आंदोलन शुरू हुए आज 68 दिन हो गए. सरकार या उनका कोई नुमाइंदा उनसे बात करने तक नहीं गया. सरकार के रवैये से ये प्रतीत हो रहा है कि ये सभी भारतीय है ही नहीं.
पीएम मोदी और उनके ग्रहमंत्री कह रहे रहे हैं कि CAA पर दोबारा विचार करने का सवाल ही नहीं...CAA पर हम एक इंच पीछे नहीं हटेंगे.
इस तरह के बयानों का क्या मतलब है? ये संविधान के अनुरूप लोकतंत्र में चुने हुए नेता हैं? इन की हठधर्मी बताती है कि ये मनुस्मृति से आत्ममुग्ध हैं।
सवाल ये है कि इन्हें बार बार ये बयान देने कि ज़रूरत क्यों पड़ रही है?
ये गांधी के देश में आज भी गांधी को नहीं हरा सकते. गांधीवादी सत्यग्रह का न कोई तोड़ है न होगा। और ये जारी रहा तो जैसे CAA2019+NRC+NRP= Divide and Rule लाया गया वैसे ही वापस लिया जायेगा।
अर्थव्यवस्था पीएम मोदी और उनकी पूरी टीम की काबू से बाहर हो चुकी है। फिलहाल कहा जा रहा है कि जितना नुकसान हो चुका है उसी की भरपाई में लगभग 25 साल लग जाएंगे मगर मौजूदा सरकार की हठधर्मी देखते ही बनती है क्योंकि वो कुछ भी सुनने, या मानने को तैयार ही नहीं। ऐसे में जबकि सरकार आरबीआई से पैसे ले ले कर काम चला रही है अगर एनआरसी लागू होता है तो भूखमरी से पहले ही जूझ रहे देश का भट्टा बैठ जाएगा।
गौर कीजिए! असम की आबादी तीन करोड़ 12 लाख है. एनआरसी की प्रक्रिया में 50 हज़ार कर्मचारी लगाए गए और अनुमानित सरकारी खर्च 1600 करोड़ रुपए आया. जनता ने जो खर्च किया वो गिनती में नहीं है। अगर यही प्रक्रिया पूरे देश में लागू होती है तो पूरे देश की आबादी लगभग 130 करोड़ है जिन पर 250 लाख करोड़ रुपए का अनुमानित खर्च आएगा जो आगे बढ़ भी सकता है। इस लिए सीएए का विरोध जरूरी है। ये संविधान की मूल भावना (प्रस्तावना) के खिलाफ है.
@MobeenJamei
Bahut umda tahreer
ReplyDeleteAllah mazeed himmat ata faramaaye
Aameen
DeleteShukriya
Dli ki bat hai door talak jayegi...
ReplyDeleteBilkul
DeleteMashaAllah very good and very important news
ReplyDeleteShukriya
Deletekhob likha janab ne....
ReplyDeleteShukriya
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