Wednesday, February 26, 2020

ना जायज़ सरकार

#DelhiRiots2020 CM HM PM 

याद कीजिए! जब अचानक सभी टूरिस्टों और दूसरे राज्य के तमाम लोगों को ये कहकर कि खुफिया एजेंसियों ने अलर्ट किया है कि कोई बड़ा आतंकवादी हमला होने को है ' अल्टीमेटम दिया गया कि सभी लोग कश्मीर जल्द अज़ जल्द छोड़ दें...फिर आपने देखा...वो बड़ा हमला 'कश्मीर के विशेष राज्य के दर्जे को छीन कर' किया गया. जिस दिन पार्लियामेंट में आर्टिकल 370 को निष्क्रिय (एक तरह से खत्म) किया गया उसी के दूसरे दिन इंडियन एक्सप्रेस में अशोका यूनिवर्सिटी के पूर्व वीसी और इंडियन एक्सप्रेस के कॉलमनिस्ट भानु प्रताप मेहता ने लिखा था कि ये कश्मीर का इंडियानाईज़ेशन तो नहीं है, हां! ये पूरे इंडिया का कश्मीराईज़ेशन ज़रूर है.
हाल ही में अलीगढ़ जाना हुआ, यूनिवर्सिटी कैंपस में इस क़दर फोर्स थी और इंटरनेट बंद था...मानो कि हम कश्मीर आ गए हों? इंटरनेट के बग़ैर रह पाना बहुत मुश्किल है. अलीगढ़ के पुराने शहर ऊपर कोर्ट में उन महिलाओं पर पथराव हुए जो शांतिपूर्ण ढंग से धरने पर बैठी थीं और सब कुछ ठीक चल रहा था. अब क्या है कि हर आदमी यहां गांधी तो नहीं है इसलिए प्रतिक्रिया में दोनों तरफ से पथराव होने लगे. रैपिड एक्शन फोर्स (आर ए एफ) और पुलिस भी उन पत्थर बाजों के साथ खड़ी नज़र आयी जो प्रदर्शनकारियों पर पथराव कर रहे थे. ये कोई नई बात नहीं है...यही होता आया है. मगर मीडिया (हिंदी अखबार, वेबसाइट टीवी) ने जो दिखाया या जिस तरह से खबरें लिखीं वो भी उत्तेजक था. उन्होंने प्रदर्शनकारियों को विलेन (गद्दार) बना कर पेश किया...खैर ये भी नया नहीं है.
अल्पसंख्यक मुसलमानों ने आज़ादी के बाद धर्म के आधार पर उत्पीड़न इतना झेला है कि वो अपने बच्चों को बचपन से ही मानसिक रूप से तैयार कर देते हैं कि यहां तुम्हारे साथ क्या क्या हो सकता है...जो भी हो तुम्हें प्रतिक्रिया नहीं देना है। अल्पसंख्यकों की लाश को नोच नोच कर खाकर फिर उन्हीं का खून पीकर राजनीति अपनी प्यास बुझाती है, मीडिया भी साथ ही साथ रहता है. मरे हुए को बार बार मारा जाता है...
एक गर्म बकरी का मिज़ाज रखने वाला शख्स अपने भविष्य को खत्म होता देख कर बावला हो गया है. वो नफरत की पहाड़ियों पर बद हवास चढ़ता चला जा रहा है मगर उसकी बेचैनी है कि कम होने का नाम नहीं लेती. उसने  सोची समझी साजिश के तहत दंगे भड़का दिए. द हिंदू की खबर के मुताबिक अब तक लगभग 38 (आधिकारिक आंकड़ा) मौतें हो चुकी हैं. ये तादाद और भी हो सकती है क्योंकि सब रिपोर्ट नहीं हो पाते और हो भी जाएं तो सरकार दबा देती है.
दिल्ली के सीएम केजरीवाल ने इन दंगों के संदर्भ में बस इतना किया कि उन्हें दिल्ली पुलिस दे दी जाए, ठीक है दिल्ली पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत है मगर सीआरपीसी के सेक्शन 129 और 130 भी हैं जिनके मुताबिक़ एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (जिला अधिकारी) दंगाई भीड़ को खदेड़ने के लिए स्पेशल ऑर्डर जारी कर सकता है. अगर कामयाबी न मिले तो वो सिविल फोर्स (पुलिस) का इस्तेमाल कर सकता है फिर भी कामयाबी न मिले तो वो केंद्र के Armed Forces (फौज) के किसी ऑफिसर को बुला सकता है...और ये एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट दिल्ली के सीएम (केजरीवाल) को रिपोर्ट करता है. राजघाट पे नौटंकी करने के बजाए अगर वो जिला अधिकारी की रिपोर्ट पर ध्यान देते तो शायद दंगा इतना न बढ़ता. कुछ नहीं तो अपने विधायकों को बुलाकर पूर्वी दिल्ली का दौरा कर सकते थे...हर विधायक को सिक्योरिटी मिली हुई है अगर 20 विधायक और सीएम ने मिलकर शांति मार्च निकाला होता तो बात कुछ और होती...सच्ची बात ये है कि ये बहते लहू और लाश को एक मौके की तरह इस्तेमाल करके दिल्ली पुलिस की अपनी मांग को मजबूत करने में लगे रहे...सब याद रखा जाएगा. केजरीवाल सरकार की पोल तो पिछले पांच सालों में ही खुल कर सामने आ गई थी जब उसने साफ सफाई के मामले में मुस्लिम इलाकों को अपने हाल पर छोड़ दिया था, वादा करने के बावजूद मुस्लिम इलाकों में स्कूल नहीं खोले, इलेक्शन से पहले सभी भाषाओं में भर्तियां निकालीं मगर उर्दू को छोड़ दिया... फिर भी हमें लगता था कि गवर्नेंस ठीक है सो वो भी खुल कर सामने आ गया.
जैसा कि टेलीग्राफ ने सुर्खी लगाई कि '... तो गुजरात मॉडल दिल्ली पहुंच गया' यही हकीकत है. केंद्रीय गृहयुद्ध मंत्री शाह ने जान बूझ कर ढील दी, दिल्ली के बॉर्डर को सील नहीं किया, अतिरिक्त फोर्स नहीं लगाए, ऑर्डर नहीं दिया. प्रधानमंत्री को तो प्रेस कॉन्फ्रेंस भी करना नहीं आता...उनका खामोश रहना उनकी मजबूरी थी.
जमियत उलमा हिंद दंगा पीड़ितों के लिए दिल्ली के बाहर कोई नई कॉलोनी बनाने का प्रोजेक्ट तैयार करने में लगी होगी ताकि जिस ज़मीन पर दंगा पीड़ित रह रहे हैं वो किसी उद्योगपति को दी जा सके और अरबों का चंदा करके मौज उड़ाई जा सके. ये भी अपने साथियों के साथ वक़्त पर नहीं पहुंचे!

Jamiat Ahle Hadees Hind
जनता (अल्पसंख्यक) का यहां कोई नाखुदा नहीं...उन्हें कश्ती खुद ही पार लगानी है. जमीयत अहले हदीस और जमीयत उलमा हिंद समेत बड़े बड़े ठेकेदार मुल्लाओं को बताना चाहिए कि कथित तौर पर उन्होंने सऊदी गवर्नमेंट को खत क्यों लिखे कि मोदी जी को अवॉर्ड दिया जाए. अब समय आ गया है कि अल्पसंख्यक मुस्लिम जज़्बाती बातों से ऊपर उठकर खामोशी से सोच विचार करें....सारे मौलवी, सारे पीर और सारी दरगाहें एक जैसी नहीं मगर दो चंद को छोड़कर कोई भी आगे नहीं आया. ये क्रीमी लेयर (सरकारी मुसलमान) हैं. खरीद व फरोख्त इनकी असल पहचान है. 
सबसे अच्छा और आसान नुस्खा इन हालात से निबटने का यही है की अपने बच्चो और बच्चियों को हायर एजुकेशन तक पुहिंचाया जाए...चाहे आधी रोटी खा कर ही गुज़ारा करना पड़े.
अगर लोकतंत्र है...तो मोदी सरकार एक ना जायज़ सरकार है...ये कुछ नहीं कर सकी...बनी बनाई अर्थव्यवस्था को तबाह करने के बाद दूसरी 'बाबरी मस्जिद' ढूढने में लगी है...CAA ही दूसरी 'बाबरी मस्जिद' है. अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए इतना तांडव मचाया जा रहा है. ट्रंप के दौरे से क्या हासिल हुआ? सिवा इसके कि मोदी और इंडिया दो अलग अलग चीजें हैं.
देखोगे तो हर मोड़ पे मिल जाएँगी लाशें

ढूँडोगे तो इस शहर में क़ातिल न मिलेगा

मालिकज़ादा मंज़ूर


कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया
बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया
कौन रोता है किसी और की ख़ातिर ऐ दोस्त
सब को अपनी ही किसी बात पे रोना आया
किस लिए जीते हैं हम किस के लिए जीते हैं
बारहा ऐसे सवालात पे रोना आया
साहिर लुधियानवी...वो सुबह कभी तो आएगी!!

@MobeenJamei

गृहयुद्धमंत्री!
रंग भी बेरंग है क्यों
तंग से भी तंग है क्यों
आज अाई कुछ बहार
दिल मगर है बे करार
झूट की ज़ुबान भी
सच की रखे आन भी
बात हो, जुमला ना हो
कुछ भी हो, बुरा ना हो
मीडिया से बैर नहीं
मोडिया की खैर नहीं
मकतल ए इंसाफ को
अद्ल का पैग़ाम दो
नोट: ये नज़्म 12 मार्च 2020 को लिखी गई.
@MobenJamei


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