धर्म और राजनीति की जाहिल और खोखली लीडरशिप ने निकाह - ए- फ़ुज़ूली में जनता का कन्यादान कर दिया। इसी लिए इन्हें ये पैगाम देना ज़रूरी है....
एक बस तू ही नहीं मुझ से ख़फ़ा हो बैठा
मैं ने जो संग तराशा था ख़ुदा हो बैठा
मस्लहत छीन ली है क़ुव्वत-ए-गुफ़्तार मगर
कुछ न कहना ही मिरा मेरी ख़ता हो बैठा
शुक्रिया ऐ मेरे क़ातिल ऐ मसीहा मेरे
ज़हर जो तू ने दिया था वो दवा हो बैठा_फ़रहत शहज़ाद
अपने आप से वादा कीजिये कि अब नहीं सोयेंगे... खैर! अब सोने का मौक़ा भी नहीं मिलेगा...ये कहिये कि पलक भी नहीं झपकेंगे.
जितना मुश्किल किसी आरएसएस-बीजेपी के सपोर्टर को समझना, समझाना है उतना ही किसी दरगाह के मालिक या मदरसे के मुफ़्ती को भी समझना, समझाना है. जब भी इन लोगों से बात कीजिये तो एक बात का एहसास बराबर शिद्दत इख़्तियार कर जाता है कि एक को तो एकेले ही हिंदुस्तान में जीना है और एक को तन्हा ही जन्नत में जाना है. ये दोनों... बात ही नहीं सुनते, झड़क कर और अक्सर बद तमीज़ी पर उतर आते हैं. इन के हिसाब से (अपनी अपनी कम्युनिटी में) जो लोग गुज़र गए वो सब से अच्छे थे और जो लोग पैदा होंगे वो सब से अच्छे होंगे. सारी खामी और खराबी मौजूदा लोगों में है.
उठ्ठो मेरी दुनिया के ग़रीबों को जगा दो
काख़-ए-उमरा के दर ओ दीवार हिला दो
गर्माओ ग़ुलामों का लहू सोज़-ए-यक़ीं से
जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ी
उस खेत के हर ख़ोशा-ए-गंदुम को जला दो _इक़बाल
साथियों! प्रदर्शन करना अपने आप में पनघट की डगर पर चलना है और जब सरकार की निय्यत ही साफ न हो... गृहमंत्री कुछ कहे, प्रधानमंत्री कुछ कहे, अल्पसंख्यक मंत्री हमेशा अलाप ही लेता रहे धुन कुछ भी हो और जनरल सिक्रेट्री प्रक्रिया का टाईम बताए तो ये और भी मुश्किल और चैलेंज भरा हो जाता है.
सितम बालाए सितम प्रदर्शनकरियों के कपड़ों की बुनियाद पर शिनाख्त करके उन्हीं के खिलाफ केस दर्ज हो रहा है. इतने लोग मर गए मगर सरकार पीछे हटने को छोड़िये...बात सुनने को तैयार नज़र नहीं आती.
गाँधी जी को पढ़िए...अंदाज़ा होगा कि सिवाए अहिंसा और विरोध के कोई रास्ता नहीं. यही वो चीज़ है कि जिसका अभी तक दुनिया कोई तोड़ नहीं निकाल पायी है. हमें थक हार कर नहीं बैठना है. इस वक़्त हम फासीवादी रेगिस्तान के मुसाफिर हैं और हमारी प्यास भी शदीद है मगर अब हम मंज़िल पर पहुँच कर ही दम लेंगे और अपनी प्यास बुझाएंगे... बहुत सराब (रेगज़ारों में दूर से पानी की तरह चमकती हुई रेत) को देख लिया.... और धोका नहीं खाएंगे फिर उन से भी आखिरी तौबा करेंगे जो हाय तौबा मचा कर बवाल करते हैं.
नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही
नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही_ फ़ैज़
शहद दिखाए ज़हर पिलाये....फ़िलहाल यही हो रहा है. इसी पैग़ाम के साथ तमाम गुर्गे हम तक पहुंचेंगे. हमें संविधान और देश बचाने के लिए अहिंसात्मक रूप से अपनी लड़ाई लड़नी है.
सूना जंगल रात अंधेरी छाई बदली काली है
सोने वालों जागते रहियो चोरों की रखवाली है
शहद दिखाए ज़हर पिलाए डाइन क़ातिल शौहर कुश
इस मुरदार पे क्या ललचाया दुनिया देखी भाली है_रज़ा
..."मर्ग-ए- अंबोह जश्न दारद" (संयुक्त मृत्यु जश्न है.)
आज भी बरेली, धारावी जैसे शहरों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं. हिम्मत से काम लीजिए. ये पागलपन है....इस से पूरा देश ओत पोत हो उठेगा।
आज हमारे दोस्त Sheyam Meera Singh ने अपने फेसबुक पोस्ट में आंकड़े देेते हुए समझााया कि
क्या कयामत है? आप भी पढ़िए...
1-
30 करोड़ लोग लैंडलेस हैं यानी उनके पास कोई जमीन नहीं है (ये आंकड़ा जेटली जी ने भी सदन में बताया था जब वह मुद्रा योजना लागू कर रहे थे) जब इन लोगों के पास जमीन नहीं है तो किसकी जमीन के डाक्यूमेंट्स दिखाएंगे?
2-
170 लाख लोग होमलेस हैं, यानी उनके पास रहने के लिए घर ही नहीं है. कोई सड़क पर सोता है कोई झुग्गी बनाकर, कोई फ्लाईओवर के नीचे, कोई रैनबसेरा में. ऐसा मैं नहीं कह रहा, केंद्र सरकार की सर्वे करने वाली संस्था NSSO कह रही है. अब मकान ही नहीं है तो क्या सड़क के कागज दिखाएंगे ये लोग, कि कौन सी सड़क के किस फ्लाईओवर के नीचे सोते हैं.
3-
15 करोड़ विमुक्त एवं घुमंतुओं की आबादी है, आपने बंजारे, गाड़िया लोहार, बावरिया, नट, कालबेलिया, भोपा, कलंदर, भोटियाल आदि के नाम सुने ही होंगे. इनके रहने, ठहरने का खुद का ठिकाना नहीं होता, आज इस शहर, कल उस शहर, जब ठिकाना नहीं तो कागज कहां से होगा. दो एक बकरी और ओढ़ने बिछाने के कपड़े के सिवाय क्या ही होता है इनके पास. अब क्या बकरी का डीएनए चेक करवाकर बताएंगे कि हारमोनियम की तरह ही अब्बा हमारे, बकरी भी छोड़ कर मरे थे.
4-
8 करोड़, 43 लाख इस देश में आदिवासी हैं जिनके बारे में खुद सरकार के पास अपर्याप्त आंकड़ें होते हैं (जनगणना 2011)
5-
आखिर में सबसे महत्वपूर्ण बात.
1970 में देश की साक्षरता दर 34 प्रतिशत भर थी...यानी 66 प्रतिशत लोग अनपढ़ थे... मतलब इस देश के 66 प्रतिशत पुरखों-बुजुर्गों के पास पढ़ाई-लिखाई के कोई कागज नहीं हैं. आज भी करीब 26 प्रतिशत यानी 31 करोड़ लोग अनपढ़ हैं. जब स्कूल ही नहीं गए तो मार्कशीट किस बात की रखी होगी.
अपने अंदर के कट्टरपन को थोड़ा ढीला करिए और अपने गांव-शहर के सबसे कमजोर- पिछड़े लोगों के घरों पर नजर दौड़इए फिर सोचिए कि उनके पास उनके दादा-परदादा के कौन कौन से डॉक्युमेंट्स होंगे? क्या नागरिकता साबित न कर पाने की हालत में इनके पास इतना धन होगा कि ये हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अपना मुकदमा लड़ सकें?
एनआरसी जैसा अनावश्यक, बेफिजूल, और अपमानजनक कानून केवल मुस्लिमों के लिए ही नहीं है. इस बात को जितना जल्दी समझ सकें समझ लीजिए. असम में भी जो हिन्दू शुरुआत में फुदक रहे थे...वही एनआरसी लागू होने के बाद अपने ही देश में "इल्लीगल" हो गए हैं. वो भी शुरुआत में कह रहे थे कि 1 करोड़ घुसपैठिए हैं, जबकि 19 लाख लोग ही थे जो अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाए हैं, उनमें भी 15 लाख तो हिन्दू ही हैं, उसमें केवल 4 लाख ही मुस्लिम, ईसाई, आदिवासी थे। अब वही हिन्दू एनआरसी से परेशान हो चुके हैं और रद्द करने की मांग कर रहे हैं. टैक्स का करोड़ों रुपए का पैसा-धेला लगा सो अलग. असम की 3.12 करोड़ आबादी पर अनुमानित सरकारी खर्च 1200 से 1600 करोड़ है जबकि देश की कुल आबादी 135 करोड़ है सोचिए कितना सरकारी खर्च होगा और आप का अलग से जो होगा वो तो छोड़ ही दीजिए. और इतना सब कुछ हो जाने के बाद रिजल्ट क्या रहा...गरीब से गरीब आदमी को सब काम छोड़कर वकीलों के चक्कर मारने पड़े, माथे का दर्द झेला, अपमान झेला, और अंत में एक भी आदमी असम से बाहर नहीं गया.
आपके दिमाग में ये सादा सी बात क्यों नहीं बैठती कि सरकार आपके ही टैक्स के पैसे से देश में सर्कस कराने जा रही है जहां बंदरों की तरह आपको ही लाइन में लगकर ये साबित करना होगा कि आप इंडियन हैं...
लगेगी आग तो आएंगे घर कई जद में,
यहां पे सिर्फ मेरा मकान थोड़ी है
*श्याम मीरा सिंह
हे भारतीय जनता! CAA 2019 को अब NRC से जोड़ कर ही देखिये. सरकार खुल कर यही कह रही है. चूँकि उस के पास हर तरह का तंत्र है सो वो गुमराह करने में कमियाब भी हो जाएगी मगर हमेशा याद रखिये कि CAA2019 संविधान की अवधारणा, प्रस्तावना, आर्टिकल 14, 15 और बुनयादी ढांचे के खिलाफ है.
अब सुप्रीम कोर्ट का इम्तेहान है कि वो CAA2019 के सहारे किसी को एहसास दिलाकर उसके साथ सौतेला बर्ताव करने की इजाज़त क्यों और कैसे देता है? हमारे पास है ही क्या! सिवाए संविधान के..! संविधान है तो हम हैं...ये नहीं तो हम भी नहीं.
ये CAA2019 "फूट डालो और राज करो" अधिनियम है. ये संविधान की रूह पर हमला है. बाबा साहेब ने कहा था कि जब तक संविधान मौजूद है समझो मैं तुम्हारे बीच ज़िंदा हूँ. काले अंग्रेज़ों की फाशिस्ट सरकार ने बाबा साहेब के वजूद पर हमला किया है. ये हरगिज़ नाक़ाबिल- ए- बर्दाश्त है...!!!
दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है_फ़ैज़
@MobeenJamei
very good bhai
ReplyDeleteShukria बड़े भय्या।
DeleteBeshak
ReplyDeleteमर्ग -ए- अंबोह जश्न दारद
ReplyDeleteJashn hai bilkul