#StandWithConstitution
ये कोई 2017-18 की बात है। जस्टिस राजेंद्र सच्चर ने एक वेबसाइट को इंटरव्यू देते हुए कहा था कि अगर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) 2019 का जनरल इलेक्शन जीतती है तो वो 2024 तक 'हिंदू राष्ट्र' होने का ऐलान कर देगी फिर भी चंद दरगाहों के सज्जादगान ने बीजेपी की हिमायत का ऐलान किया.
मुकम्मल एजंडे के तहत वर्ल्ड सूफ़ी फ़ोरम के तहत सूफ़ी कॉन्फ्रेंस किया गया और वज़ीर-ए-आज़म नरेंद्र मोदी को इफ़्तिताहिया कलीदी ख़ुतबा पेश करने का मौक़ा दिया गया। सूफ़ी कॉन्फ्रेंस का होना बेशक एक अच्छा अमल था मगर उससे पूरी दुनिया में ये पैग़ाम गया कि मुसलमनों का बड़ा हलक़ा जो अहल-ए-ख़ानक़ाह और अहल-ए-निसबत पर मुश्तमिल है; बीजेपी के साथ है और ये वही मोदी हैं जिन पर गुजरात का वज़ीर-ए-आला होने की हैसियत से 2002 के नस्ल कुश, मुस्लिम फ़सादात में एक तबक़े को खुली छूट देकर मुलव्वस होने का इल्ज़ाम लगा और अमरीका ने उन पर पाबंदी लगा दी कि वो यहां का दौरा नहीं कर सकते.
सूफ़ी कॉन्फ्रेंस से मोदी की छवि को पूरी दुनिया में बेहतर बनाने की नापाक कोशिश हुई। भारत कुछ भी हो मगर पूरी दुनिया के लिए बहुत बड़ा बाज़ार है। हर मुल़्क चाहता है कि भारत से उसके रिश्ते अच्छे रहें ताकि वो ज़्यादा से ज़्यादा अपना सामान फरोख्त करके आर्थिक रूप से समृद्ध हो सके। क्या आप नहीं देखते! यूरोपीय संसद में क़रारदाद और उस पर बहस को एक तरह से मार्च तक टाल दिया गया? ये और बात है कि दलील ये दी गई कि नागरिकता संसोधन विधेयक (सीएए) को सुप्रीमकोर्ट में चैलेंज किया गया है और अभी तक सुप्रीमकोर्ट ने कोई फ़ैसला नहीं किया है.
सुप्रीम कोर्ट का रवैय्या जगज़ाहिर है...अगर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला सीएए के हक़ में जाता है तो इस तरह बीजेपी पूरी दुनिया का मुँह बंद कर देगी कि हमारे यहां 'चेक एंड बैलंस' (तवाज़ुन) का निज़ाम है। भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि ये ऐक्ट संविधान के अनुरूप है लिहाज़ा किसी को भी हक़ नहीं कि वो भारत के अंदरूनी मामलों में टांग अड़ाए.
आज जब खुले आम जामिया मिल्लिया इस्लामीया के उन छात्रों पर गोली चलाकर 'गोडसे रिवायत' को नई ज़िंदगी दी जा रही थी जो राजघाट तक मार्च निकाल रहे थे तो अचानक मुझे अहल-ए-तसव्वुफ़ का सुलूक याद आ गया.
यूं तो धरना प्रदर्शन के माध्यम से पैग़ाम दिया जा चुका है फिर भी शाहीन बाग़ के धरने को किसी भी तौर, दिल्ली चुनाव से पहले या बाद में हटाया जायेगा क्योंकि रास्ता बंद होने से अवाम को जिन मुश्किलात का सामना करना पड़ रहा है; वो वज़ीर-ए-दाख़िला के इशारे पर पुलिस की जानिब से है बल्कि सोची समझी साज़िश है। आप नक़्शा देखिए वहां से दूसरे रास्तों का बदल (अलटरनेट) मौजूद है जिसके बारे में एलजी को भी बताया गया मगर चुनाव के वक़्त पुलिस ये काम क्यों करे?
तो ऐसे में क्या किया जाये?
तमाम ख़ानक़ाहें जिनका रिवायती तौर पर बाहम हरीफ़ होना साबित है और वो एक दूसरे से शदीद मुक़ाबला भी रखते हैं उन्हें अपने अपने ज़ाती मफ़ादात को पस-ए-पुश्त डाल कर सामने आना चाहिए। इस से पहले कि हालात बेक़ाबू होजाएं; उन्हें हुकूमत को मुत्तहिद हो कर एक पैग़ाम देना चाहिए कि हम तमाम ख़ानक़ाह जिनके मानने वाले बिला तफ़रीक़-ए-मज़हब-ओ-मिलल लातादाद हैं; हकूमत-ए-हिन्द से गुज़ारिश करते हैं कि वो अपनी ज़िद से बाज़ आए और संविधान की प्रस्तावना जो आईन की रूह है; उसे न छेड़े। हमारा मुतालबा है कि सीएए को वापिस लिया जाये या मज़हब के बजाय महज़ मज़लूमियत और सितम रसीदगी (उत्पीड़न) को ही बुनियाद बनाते हुए संसोधन करे और इस में तमाम पड़ोसी देशों को शामिल करे। बहुत हुआ हिंदू मुस्लिम...अब और नहीं।
ये रस्म-ए-शब्बीरी अदा करने का एक बेहतरीन मौक़ा है। उलमा, मशाइख़ को अपनी ज़िम्मेदारी समझते हुए अवामी जज़बात की क़दर करना चाहिए और यही सूफ़ियों की शनाख़्त है; वो कभी भी हुक्मराँ के तरफ़दार नहीं हुए.
नोट: दरगाह, मदरसे, उलमा और मशाइख़ पर मुस्तक़बिल में मेरी तरफ़ से या तो कोई हरकत ही नहीं होगी या फिर जो भी वीडीयो या तहरीर आएगी वो नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त होगी ताकि पता चल सके कि उल्मा मशाइख़ अब नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त हो चुके हैं.
बे-निशानों का निशाँ मिटता नहीं
मिटते मिटते नाम हो ही जाएगा_रज़ा
@MobeenJamei
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آپ نے بہت عمدہ لکھا۔
ReplyDeleteصوفی کانفرنس سے موذی حکومت کو کافی فائدہ پہنچا اور اس پروگرام کے لیے ان لوگوں کو کافی پیسے بھی ملے تھے۔ لیکن ان لوگوں کا کہنا ہے ہمیں موذی سے کوئی پیسہ نہیں ملا، ہم نے ان کو اس لیے بلایا تھا کہ وہ لوگ صوفیت سے آگاہ ہوں کہ صوفی سے تعلق رکھنے والے آتنگ واد نہیں ۔۔۔۔ لیکن اب تو ہمارے ہر چیز پر خطرہ ہے۔ کہاں گیۓ صوفی کانفرنس والے اور تمام خانقاہی؟
Shukria 💗
Deleteبہت عمدہ لکھا ہے بھائی وقت کی ضرورت بیان کر رہی ہے آپ کی یہ تحریر
ReplyDeleteبات بہت اچھی لکھی مگر کڑوی ہے
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