दर WhatsApp
लन-तरानी लन-तरानी, ख़ा-मख़ा की गुफ़्तगु
सारा दिन गुज़रा अबस में, चाह थी ना जुस्तजू
मस्लेहत से तीर छोड़ें, तीरगी बढ़ती ही जाये
नूर ख़्वाही इस तरह से आम है अब कु-ब-कु
हर तबाही का जहां में एक ही अंदाज़ है
सब्ज़ा ही सब्ज़ा नज़र में, सावन बरसे चार सू
जलसे हों जब रात में तो शोब्दा होना है तै
ख़ैर से हो, दिन में हो तो बात होगी ख़ूबरू
अब ज़मींदारी है साहब, पीर लोगों की यहां
मौलवी सारे लठैत हैं, बाज़ तो हैं पालतू
इब्न-ए-पीरे, पैर होवे, इब्न-ए-आलिम कुछ हो और
क्या वजह है, क्या ख़बर हो, कौन छेड़े गुफ़्तगु
ख़ानक़ाहें अब चढ़ावा, हज़रत-ए-इंसां को दें
वक़्त-ए-मुश्किल में बचा लें मुफ़लिसी की आबरू
तंग ज़हनी से निकल कर नंग ज़हनी में यहां
सब ये कहते हैं अना में, मैं हूँ मैं और तू है तू
बे वजह हमने लगाया था गले, वाट्सएप मुबीं
थी वजह अच्छी मगर थी, वो बेहस ही फ़ालतू
लन-तरानी लन-तरानी: सिर्फ अपनी बात कहना, सामने वाले की ना सुनना
ख़ा-मख़ा: बेकार, फालतू, ज़बरदस्ती वाली अबस: बेकार, जिससे कुछ हासिल ना हो जुस्तजू: तलाश, खोज, जिज्ञासा मस्लेहत: आना कानी, टाल मटोल, सबको खुश करने वाली आदत
तीरगी: अंधेरा नूर ख़्वाही: रोशनी चाहना, उजाला चाहना कु-ब-कु: गली गली, कूचा कूचा सब्ज़ा ही सब्ज़ा: हरियाली ही हरियाली शोब्दा: जादू की तरह दिखावा ख़ूबरू: अच्छी, ख़ूबसूरत पीर: दरगाह के सज्जादा नशीं
बाज़: कुछ इब्न-ए-पीरे: पीरा का बेटा इब्न-ए-आलिम: मौलवी का बेटा ख़ानक़ाहें: दरगाहें हज़रत-ए-इंसां: मनुष्य, इंसान मुफ़लिसी: अत्यंत गरीबी
आबरू: इज़्ज़त
तंग ज़हनी: नीची सोच नंग: शर्म, नंगई करना
अना: मैं मैं करना, अपनी ही बड़ाई करना
नोट: शब्दों के अर्थ के लिए कमेंट करें, जवाब में बता दिया जायेगा।
ख़ा-मख़ा: बेकार, फालतू, ज़बरदस्ती वाली अबस: बेकार, जिससे कुछ हासिल ना हो जुस्तजू: तलाश, खोज, जिज्ञासा मस्लेहत: आना कानी, टाल मटोल, सबको खुश करने वाली आदत
तीरगी: अंधेरा नूर ख़्वाही: रोशनी चाहना, उजाला चाहना कु-ब-कु: गली गली, कूचा कूचा सब्ज़ा ही सब्ज़ा: हरियाली ही हरियाली शोब्दा: जादू की तरह दिखावा ख़ूबरू: अच्छी, ख़ूबसूरत पीर: दरगाह के सज्जादा नशीं
बाज़: कुछ इब्न-ए-पीरे: पीरा का बेटा इब्न-ए-आलिम: मौलवी का बेटा ख़ानक़ाहें: दरगाहें हज़रत-ए-इंसां: मनुष्य, इंसान मुफ़लिसी: अत्यंत गरीबी
आबरू: इज़्ज़त
तंग ज़हनी: नीची सोच नंग: शर्म, नंगई करना
अना: मैं मैं करना, अपनी ही बड़ाई करना
नोट: शब्दों के अर्थ के लिए कमेंट करें, जवाब में बता दिया जायेगा।
क्यों डराते हो...!http://abirti.blogspot.com/2019/12/blog-post_19.html?m=1
अब नज़्म के बाद नस्र (लेख) यानी चंद गुज़ारिशात भी मुलाहिज़ा फ़र्मा लें!
ये बात दरुस्त है कि इस वक़्त बाज़ार से बेज़ार रहा जाये और ख़रीदारी ना की जाये मगर ये लिख कर कि 'वो आपसे सब्ज़ी ख़रीदने को तैयार नहीं हैं तो आप क्यों उनकी चीज़ें ख़रीदोगे?' गलत है। ईद की ख़रीदारी ना करें बल्कि कोरोना महामारी में अपने पैसे बचा कर रखें'....मालूम नहीं कि हालात कब बेहतर होंगे...बहारें कब आयेंगी!
आपको एहसास नहीं कि तुन्द रवी (आंधी की चाल) में आप किस क़द्र नुक़्सान कर रहे हैं। जो काबिल-ए-नफ़रीं (नफरत के के लायक़) समाज दुश्मन हैं' उन्हें यही सामग्री चाहिए ताकि वो सादा-लौह (भोले भाले) शख़्स को धर्म के नाम पर हमवार (अपने साथ) कर सकें कि वो भी सुलगती चिंगारी का हिस्सा बने, शोले की तरह भड़क उठे और फिर ख़ाक हो जाये, साथ ही वतन-ए-अज़ीज़ भारत को भी खाकिसतर (जला कर रख) कर दे। याद रहे! आज ये जो नफ़रत का पहाड़ है, कोई एक दिन की पैदा-कर्दा नहीं बल्कि तक़रीबन एक सदी मुसलसल साज़िशों का हासिल है लिहाज़ा इस का खात्मा भी एक झटके में हरगिज़ मुम्किन नहीं। बड़े एहतियात से सोशल मीडीया का इस्तिमाल करें और मीठे मीठे ज़हर से भी बचें और बचाएं!
आग का क्या है पल दो पल में लगती है
बुझते बुझते एक ज़माना लगता है
कैफ़ भोपाली
कैफ़ भोपाली
कुछ ऐसे मदरसे हैं कि उनके पास एक दहाई से ज़्यादा का बजट मौजूद है। उन्हें चाहिए कि छोटे मदरसों की मदद करें ताकि वो बंद ना हों। साथ ही अवाम में अपील करें कि वो अपने ज़कात-व -फ़ित्रात और अतियात (डोनेशन) ज़्यादा से ज़्यादा (मसारिफ़-ए -ज़कात के मुताबिक़) अपने मुस्तहिक़ अज़ीज़-व-अक़ारिब, मुहल्ले, गांव, शहर और ग़रीब भाईयों को दें, उनकी मदद करें। ये इतना मुश्किल वक़्त है कि हम अंदाज़ा भी नहीं कर सकते कि इन्सान किन तकालीफ़ और मसाइब-व -आलाम (दुख-दर्द) से गुज़र रहा है। मक़ासिद-ए-शरिया में ज़रुरीया के तहत हिफ़्ज़-ए-दीन पहले बयान किया गया मगर मैं सझता हूँ कि हिफ़्ज़-ए-जान पहले है क्योंकि जब ज़िंदगी होगी तभी तो दीन पर अमल होगा और उसकी हिफ़ाज़त होगी। दीन, दुनिया के लिए है मरने के बाद तो हिसाब (यौमुद्दीन) है, लिहाज़ा अपनी और तमाम जानों की हिफ़ाज़त करें....'जान है तो जहान है'।
Nazm_Maggi #Coronahttps://abirti.blogspot.com/2020/03/nazm-maggi-corona.html
एक नहीं, कई ख़बरें मिली हैं और मिल रही हैं कि बहुत से इलाक़ों में लापरवाही बरती जा रही है। हर शख़्स ये यक़ीनी बनाए कि वो अपनी जान की हिफ़ाज़त करेगा
मुस्लिम शरीफ़ (हसीस की किताब) में है कि 'हर शख़्स ज़िम्मेदार है और उससे उसकी ज़िम्मेदारी के बारे में पूछा जाएगा। अगर आपकी वजह से किसी की जान जाती है तो आपसे इस बाबत सवाल होगा!
सूरा ज़िलज़ाल में है कि अगर किसी ने ज़र्रा बराबर अच्छाई या बुराई की तो वो उसे ब-रोज़-ए- क़यामत देखेगा (क़ुरान)। यौम-ए- हिसाब से ख़ौफ़ करें। सूरा निसा में फ़रमाया गया,'अल्लाह तुम सब पर निगरां है'।(क़ुरान) जब रब निगरां है तो उसकी निगरानी से कौन बच सकता है! अपना और अपने घर परिवार का ख़ास ख़्याल रखें!
इसे उर्दू में पढ़ने के लिए क्लिक करें http://abirti.blogspot.com/2020/05/poetry-on-whatsapp-covid19pandemic.html?m=1
यूं बे-हिसी के दाग़ मिटाता चला गया
आता रहा जो दिल में सुनाता चला गया
@MobeenJamei
mobeenahmad.abirti@gmail.com
+917618049339
+917618049339
Nazm #Modi #budget2020 #CAAProtest http://abirti.blogspot.com/2020/02/nazm-modi-budget2020-caaprotest.html?m=1


इस तरह अशआर प्रकाशित करने के लिए कोटि कोटि नमन हो आपको
ReplyDeleteShukriya
DeleteThanks you very much for this information
ReplyDeleteShukriya
DeleteV.Nice
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