Friday, May 15, 2020

Tarawih from Dainik Jagran


تراویح...دینک جاگرن سے!

سورۂ رحمٰن کا منظوم اردو ترجمہ https://abirti.blogspot.com/2020/04/surah-ar-rahman-translation-in-urdu.html

گرمی میں موسم ہی نہیں بلکہ سب کچھ اُبال مار رہا تھا۔ مئی جون کا مہینہ تھا۔ دوپہر کے وقت حافظ صاحب کہیں سے، کسی کام سے لوٹے تھے۔ تیز قدموں سے گھر جا رہے تھے کہ کسی نے دائیں جانب سے آواز لگائی کہ حضرت! او حضرت! حافظ صاحب رک گئے اور پسینہ پونچھتے ہوئے کہا،’کیا بات ہے!‘

چھپر کے نیچے بیٹھے شخص نے کہا،’ حضرت!ایک سوال ہے۔ جواب عنایت فرمائیں‘۔

حافظ صاحب: ہاں، پوچھو! کیا سوال ہے...جلدی کرو۔ حافظ صاحب چہرے پر رومال پھیرتے ہوئے کہتے ہیں کہ گرمی کی شدت بھی اپنی انتہا کو پہنچ گئی ہے۔ 

حافظ صاحب کو ابھی حفظ مکمل کیے کوئی زیادہ عرصہ نہیں ہوا تھا۔ گاؤں، محلے کے پہلے اور نئے نویلے حافظ ہوئے تھے۔ بڑی مشکل سے کچھ مسائل کا بیان اور تقریر وغیرہ کر پاتے تھے۔ 

حافظ صاحب نے کہا کہ کیا سوال ہے۔ دیکھو! ڈھنگ کا سوال کرنا۔ ابھی ابھی ایک ضروری کام سے نامراد لوٹا ہوں... کام بھی نہیں ہوا۔ موڈ بہت خراب ہے۔ 

در اصل سائل کو دیکھ کر ہی حافظ صاحب کی اندورونی سطحیں پسینے سے بہاؤ لینے لگیں۔ سوال کا نام سنتے ہی چہرے کا رنگ بدل گیا تھا مگر جلد ہی چہرے پر ہاتھ پھیرتے ہوئے سدھار لے آئے۔ 

سائل: حضرت! سوال یہ ہے کہ حضرت آدم اور حضرت حوا علیھما السلام کا نکاح کہاں ہوا تھا؟ 

حافظ صاحب رومال سے ہاتھوں کا پسینہ پوچھتے ہوئے کہتے ہیں،’ جنت میں ہوا تھا۔ اف!‘حافظ صاحب جواب مکمل کرتے ہوئے جیسے ہی اپنا طوفانی پاؤں گھر کی طرف بڑھاتے ہیں‘ سوچا کہ تیزی لاؤں۔

تبھی سائل نے ایسے پکارا گویا حشر کا میدان ہو...’ارے رے رے حضرت! حضرت!!‘

حافظ صاحب: تھوڑا گرج کر،’ اب کیا ہے؟‘ 

جھٹ سے سائل نے زور دیتے ہوئے مزید ایک سوال داغ دیا کہ اصل سوال یہ ہے کہ ان دونوں کا نکاح کس نے پڑھایا تھا؟ 

سوال سنتے ہی حافظ صاحب کا دماغ فرش سے عرش پر چلا آیا مگر انھیں وہاں کچھ نظر نہیں آیا۔ فرش پر لوٹتے ہی آس پاس کا مطالعہ کرنے لگا۔ امید ہے کہ حافظ صاحب اینٹ یا پتھر تلاش کرنے میں لگے ہوں مگر ڈھنگ کا اینٹ یا پتھرکچھ نہیں ملا جو ڈھیلے کا کام کر سکے۔

حافظ صاحب نے اپنی تپتی اور سرخ آنکھوں سے سائل کو دیکھا اور قدرے بیزاری سے جھنجلا کر جواب دیا،’نکاح تو جنت میں ہوا تھا مگر ہم بارات نہیں گئے تھے‘۔ 

....

یہی کوئی سات آٹھ برس گذرے ہوں گے۔ موسم گرماں کی شدت ایسی تھی کہ ہرے بھرے میدانی علاقوں کی زرخیز زمین بھی سنگلاخ ہوئی جاتی تھی۔ گرمی کے کئی رنگ ہیں، انہی میں سے ایک جولائی۔اگست کی حبس والی گرمی بھی ہے۔ اس دوارن موسم بڑا بے کیف اور کاٹ کھانے والا ہو جاتا ہے کہ اے سی اور کولر بھی بے اثر سے ہو کر رہ جاتے ہیں۔ 

ماہ مبارک رمضان دینی سرگرمیوں کی بہار کے ساتھ رونما ہوا۔ سحری، افطار، نماز اور تلاوت کی چہل پہل کے ساتھ  ہی ہر طرف ماحول پُرکیف، روحانی اور خوشگوار ہو گیا تھا گویا انسانیت کو انسانوں کی آغوش میں جھوٹی ہی سہی مگر تھوڑی دیرے کے لیے سکون مل گیا۔ 

ٹویٹر ایک بہترین ہتھیار مگر احتیاط سے! https://abirti.blogspot.com/2020/04/twitterindiamuslim-ulma.html 


تراویح کی بہ جماعت نماز شروع ہوتے ہی بجلی گل ہوگئی۔ تمام نمازی اور خود امام پیسنے میں شرابور تھے۔ مسجد میں جنریٹر کا انتظام تھا مگر تراویح کے آگے کون اس جانب توجہ دے! رمضان میں مسلمان ابرِ رحمت سے براہ راست لطف اندوز ہوتا ہے مگر حفاظ کی دنیا غیر ہوجاتی ہے۔ انھیں شدید ذہنی دباؤ کا سامنا رہتا ہے۔ پورے 24 گھنٹوں میں تراویح ختم ہونے کے بعد ہی انھیں کہیں پل بھر کے لیے سکون میسر ہوتا ہے۔ اگر دورانِ تراویح دو چند لقمے مل گئے تو یہ سکون بھی غارت ہوجاتا ہے۔  

بہر کیف! تراویح حسب معمول جاری تھی۔ حافظ (امام) صاحب نے ’وَاُولٰٓئِكَ هُـمُ الْمُفْلِحُوْن‘ آیہ پر رکوع کر دیا۔ سلام پھیرا تو صف اول کے ایک زیرک مقتدی ڈاکٹر صاحب کو لگا کہ امام صاحب شاید سہو کا شکار ہوگئے اور وہ سورہ بقرہ میں آگئے تھے لہٰذا تپاک سے انہوں نے پوچھا کہ امام صاحب کہاں سے پڑھ رہے تھے؟ 

پہلے سے ہی شدید ذہنی دباؤ کے مارے اور گرمی سے بے حال امام نے قدرے بیزاری سے جھنجھلا کر جواب دیا کہ دینک جاگرن سے! 

...فوراً جلدی سے کھڑے ہوئے اور بہ آوز بلند ’اللہ اکبر‘ کہتے ہوئے نیت باندھ لی۔ 

ہمارے لیے درس یہ ہے کہ تمام الٹی سیدھی باتوں ’کَٹبیٹھی‘سوالات کے جواب علماء سے طلب نہ کریں۔ Common sense (تھوڑی سمجھ بوجھ) سے کام لیں تو بہت سے سوالوں کے جواب آپ مل جائیں گے۔ ’اصیل الاشیاء اباحۃ‘ تمام چیزیوں کی حقیقت اباحت ’جائز‘ ہے۔ دیکھنا یہ کی ضرورت کی نوعیت کیا ہے۔ 

رمضان میں حفاظ کو پریشان کرنے کے بجائے انھیں خوش رکھیں تاکہ وہ بغیر کسی ذہنی دباؤ کے ہشاش بشاش ہو کر نماز تراویح میں قرآن پڑھیں۔ 


اپیل: فی الحال  مہلک وائرس، کووِڈ-19 ’عالمی وبا‘ کے سبب قومی سطح پر لاک ڈاؤن نافذ ہے۔ بہت سے حفاظ ایسے ہوتے ہیں کہ وہ تراویح سے پورے سال کے تعلیمی اخراجات کا انتظام کر لیا کرتے ہیں مگراس بار ’الٹی پڑ گئیں سب تدبیریں‘۔ ایسے میں آپ اپنے اپنے حفاظ کی مالی مدد ضرور کریں تاکہ انھیں مسائل زیست میں آسانی ہو! کچھ فون آئے کہ وہ تراویح تو پڑھا رہے ہیں مگر کوئی امید نہیں ہے کہ کوئی ان کا ہاتھ مضبوط کرے گا۔ 

رمضان کا آخری عشرہ چل رہا ہے۔ آپ دعا کریں کہ آئین سلامت رہے! این پی آر، این آر سی اور سی اے اے جیسے کالے قانون خاک ہو جائیں۔ اس مقصد سے بڑی قربانیاں دی گئی ہیں۔

بہت سے سرکاری مدارس میں پراوئیویٹ اسٹاف کو نکال دیا گیا ہے۔ یہ بالکل ناروا ہے۔ سرکاری اسٹاف کو چاہیے کہ ایک ماہ کی تنخواہ اپنے ادارے کو عطیہ کرے تاکہ کسی طور ادارہ اور اس کی تعلیمی بہار پر خزاں نہ آئے۔ 

ہر سال بڑے مدارس سے سیکڑوں میں فارغ ہونے والے کہاں جاتے ہیں... وہ چھوٹے چھوٹے اداروں سے منسلک ہوکردینی و سماجی خدمات انجام دیتے ہیں۔ چند ہی فارغین ایسے خوش نصیب ہوتے ہیں کہ انھیں ڈھنگ کی کوئی درسگاہ مل جاتی ہے۔ بہتیرے بڑے مدارس ایڈیڈ ہیں لہٰذا چھوٹے مدارس کا خاص خیال رکھیں کیونکہ چھوٹے مدارس علماء کو سب سے زیادہ روزگار دیتے ہیں۔

بہت شکریہ محمد جنید صاحب، نئی سڑک، بارہ بنکی اور محمد اعظم بستوی صاحب مانو، حیدرآباد...آپ کے بغیر یہ تحریر میرے بس کی بات نیہں تھی۔ 

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Ramzan- taravih from Dainik Jagran



तरावीह...दैनिक जागरण से

गर्मी में मौसम ही नहीं बल्कि सब कुछ उबाल मार रहा था। मई जून का महीना था। दोपहर के वक़्त हाफ़िज़ साहिब कहीं से, किसी काम से लौटे थे। तेज़ गामी के साथ घर जा रहे थे कि किसी ने दाएं जानिब से आवाज़ लगाई कि हज़रत! ओ हज़रत!! हाफ़िज़ साहिब रुक गए और पसीना पोंछते हुए कहा,'क्या बात है!'

छप्पर के नीचे बैठे शख़्स ने कहा, हज़रत! एक सवाल है। जवाब इनायत फ़रमाएं'

हाफ़िज़ साहिब: हाँ, पूछो क्या सवाल है...जल्दी करो। हाफ़िज़ साहिब चेहरे पर रूमाल फेरते हुए कहते हैं कि गर्मी की शिद्दत भी अपनी इंतिहा को पहुंच गई है.

हाफ़िज़ साहिब को अभी हिफ़्ज़ मुकम्मल किए कोई ज़्यादा अरसा (वक़्त) नहीं हुआ था। गांव, मुहल्ले के पहले और नए नवेले हाफ़िज़ हुए थे। बड़ी मुश्किल से कुछ मसाइल का बयान और तक़रीर वग़ैरह कर पाते थे.

हाफ़िज़ साहिब ने कहा कि क्या सवाल है। देखो! ढंग का सवाल करना। अभी अभी एक ज़रूरी काम से ना मुराद लौटा हूँ.. काम भी नहीं हुआ। मूड बहुत ख़राब है.

दर असल साइल (सवाल पूछने वाले) को देख कर हाफ़िज़ साहिब की अंदरूनी सतहें पसीने से बहाव लेने लगीं। सवाल का नाम सुनते ही चेहरे का रंग बदल गया था मगर जल्द ही चेहरे पर हाथ फेरते हुए सुधार लाये.

साइल: हज़रत सवाल ये है कि हज़रत-ए-आदम और हज़रत हव्वा (अलैहिमा अस्सलाम) का निकाह कहाँ हुआ था?

हाफ़िज़ साहिब रूमाल से हाथों का पसीना पूछते हुए कहते हैं, जन्नत में हुआ था। उफ़!' हाफ़िज़ साहिब जवाब मुकम्मल करते हुए जैसे ही अपना तूफ़ानी पांव घर की तरफ़ बढ़ाते हैं और सोचा कि तेज़ी लाऊँ.

तभी साइल ने ऐसे पुकारा गोया हश्र का मैदान हो...'अरे रे रे हज़रत! हज़रत!!

हाफ़िज़ साहिब थोड़ा गरज कर, अब क्या है?

झट से साइल ने ज़ोर देते हुए मज़ीद एक सवाल दाग़ दिया कि असल सवाल ये है कि इन दोनों का निकाह किस ने पढ़ाया था?

सवाल सुनते ही हाफ़िज़ साहिब का दिमाग़ फ़र्श से अर्श पर चला आया मगर उन्हें वहां कुछ नज़र नहीं आया। फ़र्श पर लोटते ही आस-पास का मुताला (पढ़ने) करने लगा। उम्मीद है कि हाफ़िज़ साहिब ईंट या पत्थर तलाश करने में लगे हों मगर ढंग का ईंट या पत्थर कुछ नहीं मिला जो ढीले का काम कर सके.

हाफ़िज़ साहिब ने अपनी तप्ती और सुर्ख़ आँखों से साइल को देखा और क़दरे (थोड़ी) बेज़ारी से झुंझला कर जवाब दिया,'निकाह तो जन्नत में हुआ था मगर हम बारात नहीं गए थे'.

....

यही कोई सात आठ बरस गुज़रे होंगे। मौसम गर्मां की शिद्दत ऐसी थी कि हरे-भरे मैदानी इलाक़ों की ज़रख़ेज़ ज़मीन भी संगलाख़ (पथरों सी) हुई जाती थी। गर्मी के कई रंग हैं, उन्ही में से एक जुलाई अगस्त की हब्स (उमस) वाली गर्मी भी है। इस दौरान मौसम बड़ा बे-कैफ़ और काट खाने वाला हो जाता है कि ए-सी और कूलर भी बे-असर से हो कर रह जाते हैं

माह-ए-मुबारक रमज़ान दीनी सरगर्मीयों की बहार के साथ रूनुमा हुआ। सेहरी, इफ़तार, नमाज़ और तिलावत की चहल पहल के साथ ही हर तरफ़ माहौल पुर कैफ़, रुहानी और ख़ुशगवार हो गया था गोया इन्सानियत को इन्सानों की आग़ोश में झूटी ही सही, मगर थोड़ी देर के लिए सुकून मिल गया.

टांग कशीदन, ٹانگ کشیدن https://abirti.blogspot.com/2020/03/drgah-ala-hazrat-announced-boycott-of.html



तरावीह की बा जमात नमाज़ शुरू होते ही बिजली गुल हो गई। तमाम नमाज़ी और ख़ुद इमाम पीसने में शराबोर थे। मस्जिद में जनरेटर का इंतिज़ाम था मगर तरवीह के आगे कौन इस जानिब तवज्जो दे. रमज़ान में मुस्लमान अबर-ए-रहमत (रहमत के बादल) से ब राह-ए-रास्त (डायरेक्ट) लुत्फ़ अंदोज़ होता है मगर हुफ़्फ़ाज़ (हाफिज लोगों) की दुनिया ग़ैर हो (बदल) जाती है। उन्हें शदीद ज़हनी दबाव का सामना रहता है। पूरे 24 घंटों में तरावीह ख़त्म होने के बाद ही उन्हें कहीं पल-भर के लिए सुकून मयस्सर होता है। अगर दौरान-ए-तरावीह दो-चंद लुक़्मे मिल गए तो ये सुकून भी ग़ारत हो जाता है.

ब-हर कैफ़! तरावीह हसब-ए-मामूल जारी थी। हाफ़िज़ (इमाम साहिब) ने 'व उलाइका हुमुल मुफ़लिहून' आया करीमा पर रुकू कर दिया। सलाम फेरा तो सफ़-ए-अव्वल के एक ज़ीरक (दिमाग़ के तेज़) मुक़तदी डाक्टर साहिब को लगा कि इमाम साहिब शायद भूल गए और वो सूरा बक़रा में आग थे लिहाज़ा तपाक से उन्होंने पूछा कि इमाम साहिब कहाँ से पढ़ रहे थे?

पहले से ही शदीद ज़हनी दबाव के मारे और गर्मी से बेहाल इमाम ने क़दरे बेज़ारी से झुँझला कर जवाब दिया कि दैनिक जागरण से!

...फ़ौरन जल्दी से खड़े हुए और बा आवाज़-ए-बुलंद 'अल्लाहु-अकबर कहते हुए नीयत बांध ली.

हमारे लिए दर्स  (सबक़) ये है कि तमाम उल्टी सीधी बातों 'कटबैठी' सवालात के जवाब उल्मा से तलब ना करें. Common sense (थोड़ी समझ बूझ) से काम लें तो बहुत से सवालों के जवाब आप मिल जाऐंगे। 'उसैलुल अशया एबाहा'  तमाम चीजों की हक़ीक़त इबाहत 'जायज़' है। देखना ये है कि ज़रूरत की नौईयत क्या (किस तरह की और कितनी सख्त) है.

रमज़ान में हुफ़्फ़ाज़ को परेशान करने के बजाय उन्हें ख़ुश रखें ताकि वो बग़ैर किसी ज़हनी दबाव के हश्शाश बश्शाश हो कर नमाज़-ए -तरावीह में क़ुरान पढ़ सकें.

"मर्ग -ए- अंबोह जश्न दारद" https://abirti.blogspot.com/2019/12/blog-post_22.html

अपील: फ़िलहाल वैश्विक महामारी, 'कोविड19’ के कारण राष्ट्रीय स्तर पर लॉक डाउन लागु है। बहुत से हुफ़्फ़ाज़ ऐसे होते हैं कि वो तरावीह से पूरे साल के तालीमी खर्च का इंतिज़ाम कर लिया करते हैं मगर इस बार 'उल्टी पड़ गईं सब तदबीरें'। ऐसे में आप अपने अपने हुफ़्फ़ाज़ की माली मदद ज़रूर करें ताकि उन्हें मसाइल-ए-ज़ीस्त (जीवन के झमेलों) में आसानी हो! कुछ फ़ोन आए कि वो तरावीह तो पढ़ा रहे हैं मगर कोई उम्मीद नहीं है कि कोई उनका हाथ मज़बूत करेगा

क्यों डराते हो...! https://abirti.blogspot.com/2019/12/blog-post_19.html

रमज़ान का आख़िरी अशरा चल रहा है। आप दुआ करें कि संविधान सुरक्षित रहे... एन पी आर, एन आर सी और सी ए ए जैसे काले क़ानून ख़ाक हो जाएं. इसी मक़सद से बड़ी क़ुर्बानियां दी गयी हैं.

बहुत से सरकारी मदरसों में प्राइवेट स्टाफ़ को निकाल दिया गया है। ये बिलकुल नारवा (ठीक नहीं)  है। सरकारी स्टाफ़ को चाहिए कि एक माह की तनख़्वाह अपने इदारे को दे ताकि किसी तौर इदारा और उस की तालीमी बहार पर ख़िज़ां (पतझड़ का मौसम) ना आए.

हर साल बड़े मदरसों से सैकड़ों में फ़ारिग़ होने वाले कहाँ जाते हैं... वो छोटे छोटे इदारों से मुंसलिक हो कर दीनी-व-समाजी ख़िदमात अंजाम देते हैं। चंद ही फ़ारग़ीन ऐसे ख़ुश नसीब होते हैं कि उन्हें ढंग की कोई दरसगाह मिल जाती है। अक्सर बड़े मदरसे एडेड हैं लिहाज़ा छोटे मदरसों का ख़ास ख़्याल रखें क्योंकि छोटे मदरसे उल्मा को सबसे ज़्यादा रोज़गार देते हैं.

बहुत शुक्रिया मुहम्मद जुनैद साहिब, नई सड़क, बाराबन्की और मुहम्मद आज़म बस्तवी साहिब MAANUU, हैदराबाद...आपके बग़ैर ये तहरीर मेरे बस की बात  नहीं थी।

#CAAProtest अब आगे क्या किया जाये? https://abirti.blogspot.com/2020/01/caaprotest_30.html

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#Nazm संवेदनहीन https://youtu.be/bsNlHcbrVW0

Friday, May 1, 2020

hindi poetry on whatsapp #covid19pandemic


दर WhatsApp 



लन-तरानी लन-तरानी, ख़ा-मख़ा की गुफ़्तगु
सारा दिन गुज़रा अबस में, चाह थी ना जुस्तजू

मस्लेहत से तीर छोड़ें, तीरगी बढ़ती ही जाये
नूर ख़्वाही इस तरह से आम है अब कु-ब-कु 

हर तबाही का जहां में एक ही अंदाज़ है
सब्ज़ा ही सब्ज़ा नज़र में, सावन बरसे चार सू

जलसे हों जब रात में तो शोब्दा होना है तै
ख़ैर से हो, दिन में हो तो बात होगी ख़ूबरू

अब ज़मींदारी है साहब, पीर लोगों की यहां
मौलवी सारे लठैत हैं, बाज़ तो हैं पालतू

इब्न-ए-पीरे, पैर होवे, इब्न-ए-आलिम कुछ हो और
क्या वजह है, क्या ख़बर हो, कौन छेड़े गुफ़्तगु

ख़ानक़ाहें अब चढ़ावा, हज़रत-ए-इंसां को दें
वक़्त-ए-मुश्किल में बचा लें मुफ़लिसी की आबरू

तंग ज़हनी से निकल कर नंग ज़हनी में यहां
सब ये कहते हैं अना में, मैं हूँ मैं और तू है तू

बे वजह हमने लगाया था गले, वाट्सएप मुबीं
थी वजह अच्छी मगर थी, वो बेहस ही फ़ालतू

लन-तरानी लन-तरानी: सिर्फ अपनी बात कहना, सामने वाले की ना सुनना
ख़ा-मख़ा: बेकार, फालतू, ज़बरदस्ती वाली अबस: बेकार, जिससे कुछ हासिल ना हो जुस्तजू: तलाश, खोज, जिज्ञासा मस्लेहत: आना कानी, टाल मटोल, सबको खुश करने वाली आदत
तीरगी: अंधेरा नूर ख़्वाही: रोशनी चाहना, उजाला चाहना कु-ब-कु: गली गली, कूचा कूचा सब्ज़ा ही सब्ज़ा: हरियाली ही हरियाली शोब्दा: जादू की तरह दिखावा ख़ूबरू: अच्छी, ख़ूबसूरत पीर: दरगाह के सज्जादा नशीं
बाज़: कुछ इब्न-ए-पीरे: पीरा का बेटा इब्न-ए-आलिम: मौलवी का बेटा ख़ानक़ाहें: दरगाहें हज़रत-ए-इंसां: मनुष्य, इंसान मुफ़लिसी: अत्यंत गरीबी
आबरू: इज़्ज़त 
तंग ज़हनी: नीची सोच नंग: शर्म, नंगई करना
अना: मैं मैं करना, अपनी ही बड़ाई करना
नोट: शब्दों के अर्थ के लिए कमेंट करें, जवाब में बता दिया जायेगा।

क्यों डराते हो...!http://abirti.blogspot.com/2019/12/blog-post_19.html?m=1

अब नज़्म के बाद नस्र (लेख) यानी चंद गुज़ारिशात भी मुलाहिज़ा फ़र्मा लें!



ये बात दरुस्त है कि इस वक़्त बाज़ार से बेज़ार रहा जाये और ख़रीदारी ना की जाये मगर ये लिख कर कि 'वो आपसे सब्ज़ी ख़रीदने को तैयार नहीं हैं तो आप क्यों उनकी चीज़ें ख़रीदोगे?' गलत है। ईद की ख़रीदारी ना करें बल्कि कोरोना महामारी में अपने पैसे बचा कर रखें'....मालूम नहीं कि हालात कब बेहतर होंगे...बहारें कब आयेंगी!


आपको एहसास नहीं कि तुन्द रवी (आंधी की चाल) में आप किस क़द्र नुक़्सान कर रहे हैं। जो काबिल-ए-नफ़रीं (नफरत के के लायक़) समाज दुश्मन हैं' उन्हें यही सामग्री चाहिए ताकि वो सादा-लौह (भोले भाले) शख़्स को धर्म के नाम पर हमवार (अपने साथ) कर सकें कि वो भी सुलगती चिंगारी का हिस्सा बने, शोले की तरह भड़क उठे और  फिर ख़ाक हो जाये, साथ ही वतन-ए-अज़ीज़ भारत को भी खाकिसतर (जला कर रख) कर दे। याद रहे! आज ये जो नफ़रत का पहाड़ है, कोई एक दिन की पैदा-कर्दा नहीं बल्कि तक़रीबन एक सदी मुसलसल साज़िशों का हासिल है लिहाज़ा इस का खात्मा भी एक झटके में हरगिज़ मुम्किन नहीं। बड़े एहतियात से सोशल मीडीया का इस्तिमाल करें और मीठे मीठे ज़हर से भी बचें और बचाएं!

आग का क्या है पल दो पल में लगती है
बुझते बुझते एक ज़माना लगता है
कैफ़ भोपाली


कुछ ऐसे मदरसे हैं कि उनके पास एक दहाई से ज़्यादा का बजट मौजूद है। उन्हें चाहिए कि छोटे मदरसों की मदद करें ताकि वो बंद ना हों। साथ ही अवाम में अपील करें कि वो अपने ज़कात-व -फ़ित्रात और अतियात (डोनेशन) ज़्यादा से ज़्यादा (मसारिफ़-ए -ज़कात के मुताबिक़) अपने मुस्तहिक़ अज़ीज़-व-अक़ारिब, मुहल्ले, गांव, शहर और ग़रीब भाईयों को दें, उनकी मदद करें। ये इतना मुश्किल वक़्त है कि हम अंदाज़ा भी नहीं कर सकते कि इन्सान किन तकालीफ़ और मसाइब-व -आलाम (दुख-दर्द) से गुज़र रहा है। मक़ासिद-ए-शरिया में ज़रुरीया के तहत हिफ़्ज़-ए-दीन पहले बयान किया गया मगर मैं सझता हूँ कि हिफ़्ज़-ए-जान पहले है क्योंकि जब ज़िंदगी होगी तभी तो दीन पर अमल होगा और उसकी हिफ़ाज़त होगी। दीन, दुनिया के लिए है मरने के बाद तो हिसाब (यौमुद्दीन) है, लिहाज़ा अपनी और तमाम जानों की हिफ़ाज़त करें....'जान है तो जहान है'।


एक नहीं, कई ख़बरें मिली हैं और मिल रही हैं कि बहुत से इलाक़ों में लापरवाही बरती जा रही है। हर शख़्स ये यक़ीनी बनाए कि वो अपनी जान की हिफ़ाज़त करेगा

मुस्लिम शरीफ़ (हसीस की किताब) में है कि 'हर शख़्स ज़िम्मेदार है और उससे उसकी ज़िम्मेदारी के बारे में पूछा जाएगा। अगर आपकी वजह से किसी की जान जाती है तो आपसे इस बाबत सवाल होगा!

सूरा ज़िलज़ाल में है कि अगर किसी ने ज़र्रा बराबर अच्छाई या बुराई की तो वो उसे ब-रोज़-ए- क़यामत देखेगा (क़ुरान)। यौम-ए- हिसाब से ख़ौफ़ करें। सूरा निसा में फ़रमाया गया,'अल्लाह तुम सब पर निगरां है'।(क़ुरान) जब रब निगरां है तो उसकी निगरानी से कौन बच सकता है! अपना और अपने घर परिवार का ख़ास ख़्याल रखें!

इसे उर्दू में पढ़ने के लिए क्लिक करें http://abirti.blogspot.com/2020/05/poetry-on-whatsapp-covid19pandemic.html?m=1

यूं बे-हिसी के दाग़ मिटाता चला गया
आता रहा जो दिल में सुनाता चला गया
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ٹویٹر بہترین ہتھیار مگر احتیاط سے!https://abirti.blogspot.com/2020/04/twitterindiamuslim-ulma.html?m=1

لن ترانی لن ترانی، خواہ مخواہ کی گفتگو
سارا دن گذرا عبث میں، چاہ تھی نہ جستجو

مصلحت سے تیر چھوڑیں، تیرگی بڑھتی ہی جائے
نور خواہی اس طرح سے عام ہے اب کو بہ کو

ہر تباہی کا جہاں میں ایک ہی انداز ہے
سبزہ ہی سبزہ نظر میں، ساون برسے چار سو

جلسے ہوں جب رات میں تو شعبدہ ہونا ہے طے
خیر سے ہو، دن میں ہو تو بات ہوگی خوبرو

اب زمینداری ہے صاحب، پیر لوگوں کی یہاں 
مولوی سارے لَٹَھیت ہیں، بعض تو ہیں پالتو

ابنِ پیرے، پیر ہووے، ابنِ عالم کچھ ہو اور
کیا وجہ ہے، کیا خبر ہو، کون چھیڑے گفتگو

خانقاہیں اب چڑھاوا، حضرتِ انساں کو دیں
وقتِ مشکل میں بچا لیں مفلسی کی آبرو

تنگ ذہنی سے نکل کر ننگ ذہنی میں یہاں 
سب یہ کہتے ہیں انا میں، میں ہوں میں اور تو ہے تو

بے وجہ ہم نے لگایا تھا گلے وَٹسَپ مبؔیں
تھی وجہ اچھی مگر تھی، وہ بحث ہی فالتو

نوٹ: الا ما شاء اللہ کی قید بہرحال ہے!

اب نظم کے بعد نثر یعنی چند گذارشات بھی ملاحظہ فرما لیں!

 یہ بات درست ہے کہ اس وقت بازار سے بیزار رہا جائے اور خریداری نہ کی جائے مگر یہ لکھ کر کہ ’وہ آپ سے سبزی خریدنے کو تیار نہیں ہیں تو آپ کیوں ان کی چیزیں خریدوگے؟' غلط ہے۔ عید کی خریداری نہ کریں بلکہ کورونا بحران میں اپنے پیسے بچا کر رکھیں‘....معلوم نہیں کہ حالات کب بہتر ہوں گے...بہاریں کب آئیں گی!


آپ کو احساس نہیں کہ تند روی میں آپ کس قدر نقصان کر رہے ہیں۔ جو قابل نفریں سماج دشمن افراد ہیں‘ انھیں یہی مواد چاہیے تاکہ وہ سادہ لوح شخص (سناتنی) کو رام کر سکیں کہ وہ بھی سلگتی چنگاری کا حصہ بنے، شعلے کی طرح بھڑک اٹھے اور پھرخاک ہوجائے۔ ساتھ ہی وطن عزیز بھارت کو بھی خاکستر کر دے۔ یاد رہے! آج یہ جو نفرت کا پہاڑ ہے‘ ایک دن کی پیدا کردہ نہیں بلکہ تقریباً ایک صدی پیہم ریشہ داوانی کا حاصل ہے لہٰذا اس کا ازالہ بھی ایک جھٹکے میں ہرگز ممکن نہیں۔ بڑے احتیاط سے سوشل میڈیا کا استعمال کریں اور میٹھے میٹھے زہر سے بھی بچیں اور بچائیں؎

آگ کا کیا ہے پل دو پل میں لگتی ہے 
بجھتے بجھتے ایک زمانا لگتا ہے
کیف بھوپالی

بعض مدارس ایسے ہیں کہ ان کے پاس ایک دہائی سے زیادہ کا بجٹ موجود ہے۔ انھیں چاہیے کہ چھوٹے مدارس کی مالی امداد کریں تاکہ وہ بند نہ ہوں۔ ساتھ ہی عوام میں اپیل کریں کہ وہ اپنے زکوٰۃ و فطرات اور عطیات زیادہ سے زیادہ (حسب مصارف زکوٰۃ) اپنے  مستحق عزیز و اقارب، محلے، گاؤں، شہر اور غریب بھائیوں کو دیں‘ ان کی مدد کریں۔ یہ اتنا مشکل وقت ہے کہ ہم اندازہ بھی نہیں کر سکتے کہ انسان کن تکالیف اور مصائب و آلام سے گذر رہا ہے۔ مقاصد شرعیہ میں ضروریہ کے تحت حفظ دین پہلے بیان کیا گیا مگر میں سجھتا ہوں کہ حفظِ جان پہلے ہے کیونکہ جب زندگی ہوگی تبھی تو دین پر عمل ہوگا اور اس کی حفاظت ہوگی۔ دین دنیا کے لیے ہے بعد الموت تو حساب (یوم الدین) ہے لہٰذا اپنی اور تمام جانوں کی حفاظت کریں....’جان ہے تو جہان ہے‘۔


ایک نہیں‘ متعدد خبریں موصول ہورہی ہیں کہ بہت سے علاقوں میں لاپرواہی برتی جا رہی ہے۔ ہر شخص یہ یقینی بنائے کہ وہ اپنی جان کی حفاظت کرے گا۔ 

صحیح مسلم شریف میں ہے کہ ’كُلُّكُمْ رَاعٍ وَ كُلُّكُمْ مَسْؤُوْلٌ عَنْ رَّعِيَّتِهِ‘ ہر شخص ذمہ دار ہے اور اس سے اس کی ذمہ داری کے بارے میں پوچھا جائے گا۔ اگر آپ کی وجہ سے کسی کی جان جاتی ہے تو آپ سے اس ہلاکت کے بارے میں سوال ہوگا!

فَمَن يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ خَيْراً يَرَهُ ، وَمَن يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ شَرّاً يَرَهُ‘ اگر کسی نے ذرہ برابر اچھائی یا برائی کی تو وہ اسے بروز قیامت دیکھے گا (سورہ زلزال)۔ یومِ حساب سے خوف کریں۔ ’إِنَّ اللَّهَ كَانَ عَلَيْكُمْ رَقِيبًا‘ اللہ تم سب پر نگراں ہے (سورہ النساء)۔ جب رب تعالیٰ نگراں ہو، تو اس کی نگرانی سے کون بچ سکتا ہے! اپنا اور اہل خانہ کا خاص خیال رکھیں!

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غزل ’وقت ظہور عشق بھی بعثت سے کم نہیں‘https://abirti.blogspot.com/2020/03/blog-post.html?m=1

یوں بے حسی کےداغ مٹاتا چلا گیا
آتا رہا جودل میں سناتا چلا گیا

@MobeenJamei
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