इस्लामी बहनों और भाइयों! बेशक ये दौर कयामत से करीब है और शायद इसी कारण बुराइयों के लिए हर तरफ आसानियां ही आसानियां हैं और अच्छाइयों के लिए घुटन का माहौल है। बुजुर्गों ने गरीबी के बावजूद इस्लामी मदरसों को बा रौनक रखा मगर अब जबकि खुशहाली व तरक्की है तो इनका कोई पूछने वाला नहीं है। इस्लामी मदरसे दीनी किले हैं। इनकी बका में हमारी बका है और इनकी फना में हमारी फना। होना तो ये चाहिए कि जिस तरह अल्लाह के फल से हमारा मेयारे ज़िन्दगी बदला है, उसी तरह मदरसे का मेयार भी बदलता मगर शूमी-ए-किस्मत ऐसा न हो सका। इस लिए अब मेअयारी (स्टैंडर्ड) स्कूल की तलाश है और मदरसों में बच्चों को दाखिल करना मअयूब (लो स्टेटस) है।
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मदरसा अन्जुमन शेरिया
अल्लाह के रसूल ﷺ का फरमान है कि तुम में सबसे अच्छा वो है जो कुरान सीखे और सिखाए। मदरसा हाज़ा में कुरान सीखने और सिखाने का अमल जारी रखने की हकीर कोशिश है। आपसे दरख्वास्त है कि किसी भी तरह मदद का हाथ बढ़ाएं और खुलकर तआवुन करें ताकि मदरसा हाजा की अजमते रफ्ता बहाल हो और फिर से दीनी तालीम का माहौल हो।
इल्म ए दीन हासिल करना फ़र्ज़ है
मदरसा हाज़ा (#MadrasaAnjumanSheriya) की बिल्डिंग बहुत पुरानी व जर्जर है नई तामीर, अति आवश्यक है। फिलहाल यहां बेंच और टेबल की सख्त जरूरत है, मरहूमीन के ईसाले सवाब की निय्यत से एक या एक से अधिक बेंच और टेबल अतिय्या करें। हदीसे रसूल अनुसार इल्म (जरूरियाते दीन) हासिल करना फर्ज है और इसके लिए मदद करना बहुत बड़ा सवाब का काम है जिसे सदका ए जारिया कहा जाता है। सदका बलाओं और मुसीबतों को टाल देता है।
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