पढ़िए! सुप्रीम कोर्ट पर आँख खोल देने वाला लेख।
* Shyam Meera Singh
●12 जून, 1975
को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस देश की सबसे ताकतवर महिला को प्रधानमंत्री पद से बर्खास्त कर दिया!
I repeat "Prime Minister Post" !
● 28 अक्टूबर, 1998
Three judges Case, में, सुप्रीम कोर्ट ने खुद को और अधिक मजबूत किया, और कोलेजियम सिस्टम को इंट्रोड्यूस किया, इससे ये हुआ कि अब जजों की नियुक्ति खुद न्यायपालिका करेगी, न कि सरकार करेगी. इससे सरकार का हस्तक्षेप कुछ कम हुआ, तो दबाव भी कम हुआ, कुलमिलाकर इसके बाद न्यायपालिका की स्वतंत्रता और अधिक बढ़ी.
मैं नरेंद्र मोदी शपथ लेता हूँ.......
●1 दिसम्बर
जज लोया की मौत रहस्यमयी ढंग से हो जाती है, अमित शाह पर मर्डर और किडनैपिंग के मामले की सुनवाई इन्हीं जज लोया के अंडर हो रही थी. carvan मैगज़ीन ने इसपर डिटेल्ड स्टोरी की थी.
●13 अप्रैल, 2015
मोदी सरकार ने National Judicial Appointments Commission (NJAC) एक्ट पास किया, इसका मोटिव था कोलेजियम व्यवस्था को तोड़ना, और जजों की नियुक्ति में सरकार का हस्तक्षेप लाना था. एकतरह से न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर मोदी सरकार का ये पहला स्पष्ट हमला था.
●16 अक्टूबर, 2015
चूंकि अभी मोदी सरकार अपने शुरुआती दिनों में थी. न्यायपालिका में भी कुछ दम बचा हुआ था. सुप्रीम कोर्ट ने 4:1 के बहुमत के साथ, NJAC कानून को अनकॉन्स्टिट्यूशनल करार देते हुए, खत्म कर दिया. इस तरह इस पहले टकराव में न्यायपालिका की जीत हुई.
● इसके बाद न्यायपालिका मोदी सरकार के निशाने पर आ गई. अब मोदी सरकार ने जजों की नियुक्तियों को मंजूरी देने में जानबूझकर देर लगाना शुरू कर दिया. पूर्व चीफ जस्टिस टी. एस. ठाकुर ने तो सार्वजनिक मंचों से कई बार इस बात के लिए नरेंद्र मोदी सरकार मुखालफत की. चूंकि मोदी सरकार प्रत्यक्ष रूप से न्यायपालिका में हस्तक्षेप नहीं कर सकती थी, इसलिए उसने बैक डोर से हस्तक्षेप करना शुरू किया. एक जज को, उनसे उम्र में 2 बड़े जजों को पास करते हुए देश का चीफ जस्टिस बना दिया.
अब तक न्यायपालिका की हालत वहां तक आ पहुंची थी कि सर्वोच्च न्यायालय के चार जजों को प्रेस कॉन्फ्रेंस करनी पड़ गई. ऐसा देश न्यायिक इतिहास में पहली बार हुआ कि सुप्रीम कोर्ट के जजों ने कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस की हो. अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार में भी ऐसा कभी नहीं हुआ. जजों ने मीडिया में आकर कहा - "All is not okay, democracy at stake"
● आज पूरे देश की हालत क्या है, सबको पता है. पूरे देश भर में प्रदर्शन हो रहे हैं, नागरिक अधिकारों का इतना स्पष्ट हनन कभी नहीं हुआ. देश में नागरिक अधिकारों का संरक्षण करने की जिम्मेदारी न्यायालय की है. संसद के एक कानून से लोग सहमत भी हो सकते हैं, असहमत भी हो सकते हैं. लेकिन सरकार ने एक ही विकल्प छोड़ा सिर्फ सहमत होने का. अन्यथा जेल. यदि आप No CAA का पोस्टर लेकर अपने घर के सामने भी खड़े होते हैं तो पुलिस उठाकर ले जा रही है. छात्रों के प्रदर्शन पर गोलियां बरस रही हैं. आसूं गैस, और वाटर कैनन का यूज तो आम बात हो गई. लेकिन न्यायालय एक मृत संस्था की भांति मौन हुआ पड़ा है.
सरकार पर सबका इलाज है, पूर्व मुख्य न्यायाधीश गोगोई पर एक लड़की के साथ छेड़छाड़ का आरोप है. जिसकी जांच भी उन्होने स्वयं ही की. अंततः लड़की को समझौता करना पड़ा है. ऐसा भी अनुमान लगाया जाता है कि इसके पीछे सरकार और मुख्य न्यायाधीश के बीच कोई समझौता रहा है.
●9 जनवरी, 2019
CAA पर पहली सुनवाई हुई, अब आप मुख्य न्यायाधीश का बयान सुनिए.
" देश मुश्किल वक्त से गुजर रहा देश, आप याचिका नहीं शांति बहाली पर ध्यान दें! जब तक प्रदर्शन नहीं रुकते, हिंसा नहीं रुकती किसी भी याचिका पर सुनवाई नहीं होगी." आप अनुमान लगा सकते हैं कि उच्च न्यायालय के सबसे बड़े न्यायाधीश किस हद तक असंवेदनशील हो चुके हैं.
ऊपर वाली पंक्ति इस बात को साबित करने के लिए काफी है कि न्यायपालिका, सरकार की तानाशाही के आगे नतमस्तक हो चुकी है.
आज किसी भी जज की हिम्मत नहीं है कि जजों का "लोया" कर देने वाले अमित शाह के सामने मूंह खोलने की हिम्मत कर लें.
डेमोक्रेसी का एक फोर्थ पिलर मीडिया पहले ही सरकार की स्तुति गान में लगा हुआ है, ऐसे में लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण खम्बा भी अब लगभग गिर ही चुका है. बीते दशकों में न्यायपालिका एक प्रधानमंत्री को बर्खास्त करने से लेकर एक गृहमंत्री के चरणों में लिपट जाने तक का सफर तय कर चुकी है. बस उसका शव आपके सामने नहीं आने दिया जा रहा है.
एक मरी हुई 'न्यायपालिका' तानाशाह शासक और उसकी जॉम्बी भीड़ के लिए एक ढाल बन गई है, इस देश के नागरिकों को जब तक न्यायपालिका का छद्म ढांचा दिखता रहेगा, उम्मीद रहेंगी. जनता, तानाशाह का हिसाब उसकी भाषा, उसके लहजें में भी नहीं दे पाएगी. सबके सामने आ ही चुका है, न्यायपालिका में दम बचा ही नहीं है. असल में देश की न्यायपालिका अमित शाह और आरएसएस के आगे जमीन पर लेट गई है.
आप ट्रेंड देखिए पिछले 6 सालों में मोदी-शाह और आरएसएस ने सबसे पहले न्यायपालिका का ही धैर्य चेक किया है. सबसे पहले इन्होंने ज्यूडिशियल पोस्ट्स के अपॉइंटमेंट के लिए 99 वा संविधान संसोधन अधिनियम पारित करके देखा, इस कानून के द्वारा मोदी सरकार चाहती थी कि जजों की नियुक्ति खुद सरकार करे ताकि ऐसे जजों को न्यायपालिका में बिठाया जा सके, जिन्हें सरकार जब चाहे हड़का सके. लेकिन तब भाजपा सरकार की नयी-नयी थी, न्यायपालिका में थोड़ा दम बचा हुआ था, न्यायपालिका ने The National Judicial Appointments Commission (NJAC) कानून को रद्द कर दिया. जबकि यह कानून न केवल लोकसभा में पूरे बहुमत के साथ पारित हुआ था, बल्कि राज्यसभा में भी पूरे बहुमत के साथ पास हुआ था, राष्ट्रपति ने भी इस कानून पर अपने साइन कर दिए थे, मतलब NJAC act एक प्रॉपर कानून बन चुका था. लेकिन न्यायपालिका ने इस सबके बावजूद ये कहते हुए इस कानून को रद्द कर दिया था कि यह क़ानून, देश के संविधान के खिलाफ है, और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सरकार का हमला है.
ये नरेंद्र मोदी सरकार और देश की न्यायपालिका के बीच पहला टकराव था. जिसमें न्यायपालिका की जीत हुई.
आज स्थिति ये है कि न्यायपालिका की हिम्मत नहीं है कि नरेंद्र मोदी सरकार पर अंकुश लगा सके. सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों के अंदर डर पसरा हुआ है. सबको अपनी संपत्ति, अपनी जानमाल का खतरा है. सबके अंदर डर बैठा हुआ है, सब जानते हैं, तड़ीपार गृहमंत्री जिसे चाहे जज लोया की तरह शहीद कर सकता है।
जिस न्यायपालिका को देश के नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करनी थी, वह अपनी सैलरी, अपनी पेंशन, अपनी जान बचाने में लगी हुई है. आज नागरिकों को पोस्टर लेकर खड़े होने पर भी गिरफ्तार कर लिया जा रहा है! कोई नागरिक अधिकार इस देश में है कि नहीं? पूरे CAA प्रोटेस्ट के दौरान पुलिस ने नागरिकों के साथ क्या-क्या जुल्म नहीं किया है, पीटा, जलील किया, जेलों में डाल दिया, जिसे चाहा उसे डिटैन कर लिया.
यदि देश की न्यायपालिका एक तानाशाह शासक के विरुद्ध अपने नागरिकों के मूल अधिकारों का संरक्षण भी नहीं कर सकती तो उसे समय रहते अपने पदों से इस्तीफा दे देना चाहिए, उस जगह को घेरे नहीं रखना चाहिए, जो देश के नागरिकों की आजादी का सिंबल है. कम से कम नागरिकों को घोषित रूप से पता तो चल सकेगा कि इस देश में राष्ट्रपति शासन लागू हो चुका है, नागरिकों को पता तो चल जाएगा कि देश में आरएसएस का शासन लागू हो चुका है.
इससे कम से कम ये तो पता चल जाएगा कि जनता को अपनी लड़ाई खुद लड़नी है, एक मृत न्यायपालिका के भरोसे नहीं रहना है.ये देश अपनी आजादी की दूसरी लड़ाई खुद लड़ लेगा.
थोड़ा बहुत संविधान और कानून पढ़ा है, इसलिए मुझे पता है, इसे लिखना कंटेम्प्ट ऑफ कौर्ट हो सकता है, सेक्शन 124 के तहत राजद्रोह भी हो सकता है. लेकिन मुझे इस बात का भी अहसास है कि तानाशाही राजा ल शासन में किया गया 'राजद्रोह' एक सच्चे नागरिक का पहला कर्तव्य होती है.
*शयाम सिंह मीरा, जर्नलिस्ट हैं। मुख्तलिफ मुद्दों पर अपने विचार फेसबुक पर डालते रहते हैं। हम ने उन्ही की इजाज़त से ये लेख प्रकाशित किया है।
@MobeenJamei


















