Friday, January 31, 2020

'न्यायपालिका' का 'शव' #SupremeCourt

पढ़िए! सुप्रीम कोर्ट पर आँख खोल देने वाला लेख।

* Shyam Meera Singh


मीडिया के बाद 'न्यायपालिका' का 'शव' भी आपके सामने आने के लिए तैयार है. इस पूरी क्रोनोलॉजी पर आपका ध्यान नहीं गया होगा~

●12 जून, 1975
को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस देश की सबसे ताकतवर महिला को प्रधानमंत्री पद से बर्खास्त कर दिया!

I repeat "Prime Minister Post" !

● 28 अक्टूबर, 1998
Three judges Case, में, सुप्रीम कोर्ट ने खुद को और अधिक मजबूत किया, और कोलेजियम सिस्टम को इंट्रोड्यूस किया, इससे ये हुआ कि अब जजों की नियुक्ति खुद न्यायपालिका करेगी, न कि सरकार करेगी. इससे सरकार का हस्तक्षेप कुछ कम हुआ, तो दबाव भी कम  हुआ, कुलमिलाकर इसके बाद न्यायपालिका की स्वतंत्रता और अधिक बढ़ी.
••••••••••••इसके बाद आई मोदी सरकार••••••••

●16 मई, 2014
मैं नरेंद्र मोदी शपथ लेता हूँ.......

●1 दिसम्बर
जज लोया की मौत रहस्यमयी ढंग से हो जाती है, अमित शाह पर मर्डर और किडनैपिंग के मामले की सुनवाई इन्हीं जज लोया के अंडर हो रही थी. carvan मैगज़ीन ने इसपर डिटेल्ड स्टोरी की थी.

●13 अप्रैल, 2015
मोदी सरकार ने National Judicial Appointments Commission (NJAC) एक्ट पास किया, इसका मोटिव था कोलेजियम व्यवस्था को तोड़ना, और जजों की नियुक्ति में सरकार का हस्तक्षेप लाना था. एकतरह से न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर मोदी सरकार का ये पहला स्पष्ट हमला था.

●16 अक्टूबर, 2015
चूंकि अभी मोदी सरकार अपने शुरुआती दिनों में थी. न्यायपालिका में भी कुछ दम बचा हुआ था. सुप्रीम कोर्ट ने 4:1 के बहुमत के साथ, NJAC कानून को अनकॉन्स्टिट्यूशनल करार देते हुए, खत्म कर दिया. इस तरह इस पहले टकराव में न्यायपालिका की जीत हुई.

● इसके बाद न्यायपालिका मोदी सरकार के निशाने पर आ गई. अब मोदी सरकार ने जजों की नियुक्तियों को मंजूरी देने में जानबूझकर देर लगाना शुरू कर दिया. पूर्व चीफ जस्टिस टी. एस. ठाकुर ने तो सार्वजनिक मंचों से कई बार इस बात के लिए नरेंद्र मोदी सरकार मुखालफत की.  चूंकि मोदी सरकार प्रत्यक्ष रूप से न्यायपालिका में हस्तक्षेप नहीं कर सकती थी, इसलिए उसने बैक डोर से हस्तक्षेप करना शुरू किया. एक जज को, उनसे उम्र में 2 बड़े जजों को पास करते हुए देश का चीफ जस्टिस बना दिया. 

● 11 जनवरी, 2018
अब तक न्यायपालिका की हालत वहां तक आ पहुंची थी कि सर्वोच्च न्यायालय के चार जजों को प्रेस कॉन्फ्रेंस करनी पड़ गई. ऐसा देश न्यायिक इतिहास में पहली बार हुआ कि सुप्रीम कोर्ट के जजों ने कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस की हो. अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार में भी ऐसा कभी नहीं हुआ. जजों ने मीडिया में आकर कहा - "All is not okay, democracy at stake"

● आज पूरे देश की हालत क्या है, सबको पता है. पूरे देश भर में प्रदर्शन हो रहे हैं, नागरिक अधिकारों का इतना स्पष्ट हनन कभी नहीं हुआ. देश में नागरिक अधिकारों का संरक्षण करने की जिम्मेदारी न्यायालय की है. संसद के एक कानून से लोग सहमत भी हो सकते हैं, असहमत भी हो सकते हैं. लेकिन सरकार ने एक ही विकल्प छोड़ा सिर्फ सहमत होने का. अन्यथा जेल. यदि आप No CAA का पोस्टर लेकर अपने घर के सामने भी खड़े होते हैं तो पुलिस उठाकर ले जा रही है. छात्रों के प्रदर्शन पर गोलियां बरस रही हैं. आसूं गैस, और वाटर कैनन का यूज तो आम बात हो गई. लेकिन न्यायालय एक मृत संस्था की भांति मौन हुआ पड़ा है.

सरकार पर सबका इलाज है, पूर्व मुख्य न्यायाधीश गोगोई पर एक लड़की के साथ छेड़छाड़ का आरोप है. जिसकी जांच भी उन्होने स्वयं ही की. अंततः लड़की को समझौता करना पड़ा है. ऐसा भी अनुमान लगाया जाता है कि इसके पीछे सरकार और मुख्य न्यायाधीश के बीच कोई समझौता रहा है.

●9 जनवरी, 2019
CAA पर पहली सुनवाई हुई, अब आप मुख्य न्यायाधीश का बयान सुनिए.
" देश मुश्किल वक्त से गुजर रहा देश, आप याचिका नहीं शांति बहाली पर ध्यान दें! जब तक प्रदर्शन नहीं रुकते, हिंसा नहीं रुकती किसी भी याचिका पर सुनवाई नहीं होगी." आप अनुमान लगा सकते हैं कि उच्च न्यायालय के सबसे बड़े न्यायाधीश किस हद तक असंवेदनशील हो चुके हैं.
चीफ जस्टिस बोबड़े के अगली पंक्ति पर तो आप सर पकड़ लेंगे, बोबड़े कहते हैं- "हम कैसे डिसाइड कर सकते हैं कि संसद द्वारा बनाया कानून संवैधानिक है कि नहीं?"

ऊपर वाली पंक्ति इस बात को साबित करने के लिए काफी है कि न्यायपालिका, सरकार की तानाशाही के आगे नतमस्तक हो चुकी है.

आज किसी भी जज की हिम्मत नहीं है कि जजों का "लोया" कर देने वाले अमित शाह के सामने मूंह खोलने की हिम्मत कर लें.

डेमोक्रेसी का एक फोर्थ पिलर मीडिया पहले ही सरकार की स्तुति गान में लगा हुआ है, ऐसे में लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण खम्बा भी अब लगभग गिर ही चुका है. बीते दशकों में न्यायपालिका एक प्रधानमंत्री को बर्खास्त करने से लेकर एक गृहमंत्री के चरणों में लिपट जाने तक का सफर तय कर चुकी है. बस उसका शव आपके सामने नहीं आने दिया जा रहा है.
वक्त आ गया है कि सुप्रीम कोर्ट के सभी न्यायाधीश अपने पद से इस्तीफा दे दें, ताकि आधिकारिक रूप से इमरजेंसी घोषित हो सके-

एक मरी हुई 'न्यायपालिका' तानाशाह शासक और उसकी जॉम्बी भीड़ के लिए एक ढाल बन गई है, इस देश के नागरिकों को जब तक न्यायपालिका का छद्म ढांचा दिखता रहेगा, उम्मीद रहेंगी. जनता, तानाशाह का हिसाब उसकी भाषा, उसके लहजें में भी नहीं दे पाएगी. सबके सामने आ ही चुका है, न्यायपालिका में दम बचा ही नहीं है. असल में देश की न्यायपालिका अमित शाह और आरएसएस के आगे जमीन पर लेट गई है.

आप ट्रेंड देखिए पिछले 6 सालों में मोदी-शाह और आरएसएस ने सबसे पहले न्यायपालिका का ही धैर्य चेक किया है. सबसे पहले इन्होंने ज्यूडिशियल पोस्ट्स के अपॉइंटमेंट के लिए 99 वा संविधान संसोधन अधिनियम पारित करके देखा, इस कानून के द्वारा मोदी सरकार चाहती थी कि जजों की नियुक्ति खुद सरकार करे ताकि ऐसे जजों को न्यायपालिका में बिठाया जा सके, जिन्हें सरकार जब चाहे हड़का सके. लेकिन तब भाजपा सरकार की नयी-नयी थी, न्यायपालिका में थोड़ा दम बचा हुआ था, न्यायपालिका ने The National Judicial Appointments Commission (NJAC) कानून को रद्द कर दिया. जबकि यह कानून न केवल लोकसभा में पूरे बहुमत के साथ पारित हुआ था, बल्कि राज्यसभा में भी पूरे बहुमत के साथ पास हुआ था, राष्ट्रपति ने भी इस कानून पर अपने साइन कर दिए थे, मतलब NJAC act एक प्रॉपर कानून बन चुका था. लेकिन न्यायपालिका ने इस सबके बावजूद ये कहते हुए इस कानून को रद्द कर दिया था कि यह क़ानून, देश के संविधान के खिलाफ है, और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सरकार का हमला है.

ये नरेंद्र मोदी सरकार और देश की न्यायपालिका के बीच पहला टकराव था. जिसमें न्यायपालिका की जीत हुई.
 
लेकिन पिछले 6 सालों के भीतर, मोदी सरकार ने जजों की नियुक्तियों में ऐर-फेर करके, लेट-लतीफी करके, दबाव बनाके न्यायपालिका को लुंजपुंज कर दिया है. आपने देखा ही अमित शाह के केस की सुनवाई करने वाले जज लोया की रहस्मयी ढंग से हत्या करवा दी गई. सबको पता है किसने करवाई थी. इस जज लोया की हत्या और उसमें शाह की भूमिका पर Caravan मैगज़ीन ने एक डिटेल्ड स्टोरी भी की थी. उसके बाद आपने देखा था किस तरह चार जजों ने इतिहास में पहली बार प्रेस कॉन्फ्रेंस करके देश की जनता से अपील की थी कि देश की न्यायपालिका की स्वतंत्रता खतरे में है.

आज स्थिति ये है कि न्यायपालिका की हिम्मत नहीं है कि  नरेंद्र मोदी सरकार पर अंकुश लगा सके. सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों के अंदर डर पसरा हुआ है. सबको अपनी संपत्ति, अपनी जानमाल का खतरा है. सबके अंदर डर बैठा हुआ है, सब जानते हैं, तड़ीपार गृहमंत्री जिसे चाहे जज लोया की तरह शहीद कर सकता है।

जिस न्यायपालिका को देश के नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करनी थी, वह अपनी सैलरी, अपनी पेंशन, अपनी जान बचाने में लगी हुई है. आज नागरिकों को पोस्टर लेकर खड़े होने पर भी गिरफ्तार कर लिया जा रहा है! कोई नागरिक अधिकार इस देश में है कि नहीं? पूरे CAA प्रोटेस्ट के दौरान पुलिस ने नागरिकों के साथ क्या-क्या जुल्म नहीं किया है, पीटा, जलील किया, जेलों में डाल दिया, जिसे चाहा उसे डिटैन कर लिया.  


प्रोटेस्ट करने का अधिकार इस देश के नागरिकों को है या नहीं?

यदि देश की न्यायपालिका एक तानाशाह शासक के विरुद्ध अपने नागरिकों के मूल अधिकारों का संरक्षण भी नहीं कर सकती तो उसे समय रहते अपने पदों से इस्तीफा दे देना चाहिए, उस जगह को घेरे नहीं रखना चाहिए, जो देश के नागरिकों की आजादी का सिंबल है. कम से कम नागरिकों को घोषित रूप से पता तो चल सकेगा कि इस देश में राष्ट्रपति शासन लागू हो चुका है, नागरिकों को पता तो चल जाएगा कि देश में आरएसएस का शासन लागू हो चुका है.

इससे कम से कम ये तो पता चल जाएगा कि जनता को अपनी लड़ाई खुद लड़नी है, एक मृत न्यायपालिका के भरोसे नहीं रहना है.ये देश अपनी आजादी की दूसरी लड़ाई खुद लड़ लेगा.

थोड़ा बहुत संविधान और कानून पढ़ा है, इसलिए मुझे पता है, इसे लिखना कंटेम्प्ट ऑफ कौर्ट हो सकता है, सेक्शन 124 के तहत राजद्रोह भी हो सकता है. लेकिन मुझे इस बात का भी अहसास है कि तानाशाही राजा ल शासन में किया गया 'राजद्रोह' एक सच्चे नागरिक का पहला कर्तव्य होती है.


*शयाम सिंह मीरा, जर्नलिस्ट हैं।  मुख्तलिफ मुद्दों पर अपने विचार फेसबुक पर डालते रहते हैं। हम ने उन्ही की इजाज़त से ये लेख प्रकाशित किया है।
 
दो दिन पहले, मैं ने खुद इसी मुद्दे पर लिखने का मन बनाया था मगर... मगर का मतलब आप समझ सकते हैं।
Spacial Thanks to Sheyma Singh Meera. 
@MobeenJamei
   

Thursday, January 30, 2020

#CAAProtest अब आगे क्या किया जाये?

#StandWithConstitution


ये कोई 2017-18 की बात है। जस्टिस राजेंद्र सच्चर ने एक वेबसाइट को इंटरव्यू देते हुए कहा था कि अगर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) 2019 का जनरल इलेक्शन जीतती है तो वो 2024 तक 'हिंदू राष्ट्र' होने का ऐलान कर देगी फिर भी चंद दरगाहों के सज्जादगान ने बीजेपी की हिमायत का ऐलान किया.

मुकम्मल एजंडे के तहत वर्ल्ड सूफ़ी फ़ोरम के तहत सूफ़ी कॉन्फ्रेंस किया गया और वज़ीर-ए-आज़म नरेंद्र मोदी को इफ़्तिताहिया कलीदी ख़ुतबा पेश करने का मौक़ा दिया गया। सूफ़ी कॉन्फ्रेंस का होना बेशक एक अच्छा अमल था मगर उससे पूरी दुनिया में ये पैग़ाम गया कि मुसलमनों का बड़ा हलक़ा जो अहल-ए-ख़ानक़ाह और अहल-ए-निसबत पर मुश्तमिल है; बीजेपी के साथ है और ये वही मोदी हैं जिन पर गुजरात का वज़ीर-ए-आला होने की हैसियत से 2002 के नस्ल कुश, मुस्लिम फ़सादात में एक तबक़े को खुली छूट देकर मुलव्वस होने का इल्ज़ाम लगा और अमरीका ने उन पर पाबंदी लगा दी कि वो यहां का दौरा नहीं कर सकते.


सूफ़ी कॉन्फ्रेंस से मोदी की छवि को पूरी दुनिया में बेहतर बनाने की नापाक कोशिश हुई। भारत कुछ भी हो मगर पूरी दुनिया के लिए बहुत बड़ा बाज़ार है। हर मुल़्क चाहता है कि भारत से उसके रिश्ते अच्छे रहें ताकि वो ज़्यादा से ज़्यादा अपना सामान फरोख्त करके आर्थिक रूप से समृद्ध हो सके। क्या आप नहीं देखते! यूरोपीय संसद में क़रारदाद और उस पर बहस को एक तरह से मार्च तक टाल दिया गया? ये और बात है कि दलील ये दी गई कि नागरिकता संसोधन विधेयक (सीएए) को सुप्रीमकोर्ट में चैलेंज किया गया है और अभी तक सुप्रीमकोर्ट ने कोई फ़ैसला नहीं किया है.

सुप्रीम कोर्ट का रवैय्या जगज़ाहिर है...अगर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला सीएए के हक़ में जाता है तो इस तरह बीजेपी पूरी दुनिया का मुँह बंद कर देगी कि हमारे यहां 'चेक एंड बैलंस' (तवाज़ुन) का निज़ाम है। भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि ये ऐक्ट संविधान के अनुरूप है लिहाज़ा किसी को भी हक़ नहीं कि वो भारत के अंदरूनी मामलों में टांग अड़ाए.

आज जब खुले आम जामिया मिल्लिया इस्लामीया के उन छात्रों पर गोली चलाकर 'गोडसे रिवायत' को नई ज़िंदगी दी जा रही थी जो राजघाट तक मार्च निकाल रहे थे तो अचानक मुझे अहल-ए-तसव्वुफ़ का सुलूक याद आ गया.

यूं तो धरना प्रदर्शन के माध्यम से पैग़ाम दिया जा चुका है फिर भी शाहीन बाग़ के धरने को किसी भी तौर, दिल्ली चुनाव से पहले या बाद में हटाया जायेगा क्योंकि रास्ता बंद होने से अवाम को जिन मुश्किलात का सामना करना पड़ रहा है; वो वज़ीर-ए-दाख़िला के इशारे पर पुलिस की जानिब से है बल्कि सोची समझी साज़िश है। आप नक़्शा देखिए वहां से दूसरे रास्तों का बदल (अलटरनेट) मौजूद है जिसके बारे में एलजी को भी बताया गया मगर चुनाव के वक़्त पुलिस ये काम क्यों करे?

तो ऐसे में क्या किया जाये?

तमाम ख़ानक़ाहें जिनका रिवायती तौर पर बाहम हरीफ़ होना साबित है और वो एक दूसरे से शदीद मुक़ाबला भी रखते हैं उन्हें अपने अपने ज़ाती मफ़ादात को पस-ए-पुश्त डाल कर सामने आना चाहिए। इस से पहले कि हालात बेक़ाबू होजाएं; उन्हें हुकूमत को मुत्तहिद हो कर एक पैग़ाम देना चाहिए कि हम तमाम ख़ानक़ाह जिनके मानने वाले बिला तफ़रीक़-ए-मज़हब-ओ-मिलल लातादाद हैं; हकूमत-ए-हिन्द से गुज़ारिश करते हैं कि वो अपनी ज़िद से बाज़ आए और संविधान की प्रस्तावना जो आईन की रूह है; उसे न छेड़े। हमारा मुतालबा है कि सीएए को वापिस लिया जाये या मज़हब के बजाय महज़ मज़लूमियत और सितम रसीदगी (उत्पीड़न) को ही बुनियाद बनाते हुए संसोधन करे और इस में तमाम पड़ोसी देशों को शामिल करे। बहुत हुआ हिंदू मुस्लिम...अब और नहीं।

ये रस्म-ए-शब्बीरी अदा करने का एक बेहतरीन मौक़ा है। उलमा, मशाइख़ को अपनी ज़िम्मेदारी समझते हुए अवामी जज़बात की क़दर करना चाहिए और यही सूफ़ियों की शनाख़्त है; वो कभी भी हुक्मराँ के तरफ़दार नहीं हुए.

नोट: दरगाह, मदरसे, उलमा और मशाइख़ पर मुस्तक़बिल में मेरी तरफ़ से या तो कोई हरकत ही नहीं होगी या फिर जो भी वीडीयो या तहरीर आएगी वो नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त होगी ताकि पता चल सके कि उल्मा मशाइख़ अब नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त हो चुके हैं.

बे-निशानों का निशाँ मिटता नहीं
मिटते मिटते नाम हो ही जाएगा_रज़ा
@MobeenJamei

उर्दू में यहाँ पढ़ें...



Wednesday, January 29, 2020

Preamble as a Nazm/Kavita

पढ़िए! कविता के रूप में भारतीय संविधान की प्रस्तावना 

रचनाकार /कवि : ग़ुलाम गौस 


हम भारतीय हैं, हम भारतीय
करते हैं यह अज़्म शहरी तमाम
बनाएंगे भारत में ऐसा निज़ाम
जो हो आला, समाजी, और हाकिम अवाम
न हो जो किसी एक मज़हब के नाम
क्योंकि हम भारतीय हैं, हम भारतीय

जहां इंसाफ हर दम सभी को मिले
समाजी, मआशी, सियासी मिले
तरक्की का हाथों में मश-अल लिए
दिल से गाए, झूमे और यह कहे
कि हम भारतीय हैं, हम भारतीय

दीन -ओ- इबादत में आज़ाद हों
ख्यालों के इज़हार में शाद हों
यक्सां मावाक़े से आबाद हों
हैसियत में सभी लोग हम्ज़ाद हों
क्योंकि हम भारतीय हैं हम भारतीय

उखुव्वत का दीपक जलाएंगे हम
अज़मतफर्द को भी बढ़ाएंगे हम
कौमी वहदत का जाम पिलाएंगे हम
सालमियत यकीनी बनाएंगे हम
क्योंकि हम भारतीय हैं हम भारतीय

छब्बीस नवंबर उन्चास को
आईन - ए- हिंद की सभी बात को
आज करते हैं नाफिज़ जो भी कहो
सारी दुनिया को तुम यह बतला ही दो
कि हम भारतीय हैं हम भारतीय
*कवि जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली के पूर्व छात्र हैं।

अज़्म =  having solemnly resolved
मआशी =  अर्थव्यवस्था 
दीन = मज़हब
यक्सां मावाक़े = Equal opportunities
हम्ज़ाद = बराबर, साथ सााथ
उखुव्वत = भाईचारा
अज़मत ए फर्द = नागरिक का शान
कौमी वहदत =  राष्ट्रीय एकता
सालमियत = सिक्योरिटी, अटूट, अभिन्न
आईन = संविधान
नाफिज़ = लागू किया जाना

Wednesday, January 22, 2020

मुख्यमठी

एक मूडी शख्स ने बचपन चय्याशी की नज़्र कर दी. बड़ा हुआ शादी हुई पर भाग खड़ा हुआ. उस महिला का जीवन कितना दर्दनाक होगा जिसे जन्म जन्म के बंधन में बांध दिया गया और एक भी जन्म का साथ और सुख नहीं दिया गया . कयामत से कम नहीं कि उसे तलाक़ भी मयस्सर न हुई कि वो अपनी नई ज़िंदगी शुरू कर सके...
...पांच जून 1972 को अजय सिंह बिष्ट का जन्म उत्तराखंड में हुआ. वो भाग्य का धनी था उसने 5 फरवरी 1994 को नाथ संप्रदाय के सबसे प्रमुख मठ गोरखनाथ मंदिर के उत्तराधिकारी के रूप में अपने गुरु महंत अवैद्यनाथ से दीक्षा पायी. इस मठ को कुमारिल भट्ट के उसी आंदोलन से जोड़ कर देखा जाना चाहिए जो सनातन कर्मकांड के खिलाफ मूवमेंट खड़ा करने वाले गौतम बुद्ध के भिक्षुओं को कुचलने के लिए चलाई गयी थी. अयोध्या बौद्ध और जैन का केंद्र था. जिस नरक (ब्रह्मणवाद) से गौतम बुद्ध ने भारत को निकालने की कोशिश की थी उसी नरक में दोबारा उसे ठेल दिया गया.

बिष्ट को जो मिला क़िस्मत से मिला. बिष्ट की क्वालिफिकेशन जानने की क़तई ज़रूरत नहीं. धर्म, अंधों के ज़रिए, अंधों के लिए और अंधों का होता है. कभी धार्मिक गुरु बड़े विद्वान हुआ करते थे लेकिन अब सिर्फ दूसरी कम्युनिटी (फ़र्ज़ी दुश्मन) के खिलाफ हद दर्जा नफरती होना काफी है... वरना आप ही सोचो कि बाल बिष्ट का उच्चारण तक ठीक नहीं है मगर वो छत्रिय होने के बावजूद मठाधीश है तो है.

मठाधीश ही की तरह राजनीति भी उसे क़िस्मत से मिल गयी. गोरखपुर सीट से उसके गुरु सांसद चुने जाते रहे हैं और गुरु ने शिष्य को राजनीतिक उत्तराधिकारी भी बना दिया. दुनिया के किसी धर्म में चुनाव नहीं होता जो थोड़ा बहुत था उसे भी ख़त्म कर दिया गया है. 
राजनीतिक संघर्ष में कभी बिष्ट किसी पॉलिसी पर बात करते हुए नहीं सुने गए कि उनकी बुद्धिमत्ता और नेता वाली सूझ बूझ का पता चल सके।  उनके लिए सबसे अहम मुद्दा हिन्दू-मुस्लिम रहा है. वो दिन दूनी रत चौगनी इसी में लगे रहे और धीरे धीरे हिंदुत्व के फायरब्रांड नेता बन गए. राजनीति में लम्बी पारी खेलने के लिए उन्होंने हिन्दू युवा वाहिनी बनायी जिस पर गोरखपुर, देवरिया, महाराजगंज, कुशीनगर, सिद्धार्थनगर से लेकर मऊ, आज़मगढ़ तक मुसलमानों पर हमले और सांप्रदायिक हिंसा भड़काने के दर्जनों मामले दर्ज हैं.
ये वही संगठन है जिसने कुशीनगर और महराजगंज के इलाकों में मुस्लिम लड़कियों का हिंदूकरण जम कर किया। संगठन और उसके आकाओं को कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि सामने वाले पर क्या बीतेगी? हिंदुत्व के संरक्षण में संगठन ये काम निष्ठावान करता है। ये आरएसएस की तरह पुरखों (अतीत) में गौरव ढूंडने में लगा हुआ है। ये आज पर भविष्य की बुनियाद रखने में यकीन नहीं रखता। 

अजय सिंह बिष्ट उर्फ़ योगी आदित्य नाथ के कुछ बयानों पर एक नज़र डालिए...

जून 2016: "जब अयोध्या में विवादित ढांचा गिराने से कोई नहीं रोक सका तो मंदिर बनाने से कौन रोकेगा."

अक्टूबर 2016: "मूर्ति विसर्जन से होने वाला प्रदूषण दिखता है लेकिन बकरीद के दिन हज़ारों निरीह पशु काटे गए काशी में, उनका ख़ून सीधे गंगा जी में बहा है क्या वो प्रदूषण नहीं था?"

अक्टूबर 2015: दादरी हत्याकांड पर योगी ने कहा - "यूपी कैबिनेट के मंत्री आजम ख़ान ने जिस तरह यूएन जाने की बात कही है, उन्हें तुरंत बर्ख़ास्त किया जाना चाहिए. आज ही मैंने पढ़ा कि अख़लाक़ पाकिस्तान गया था और उसके बाद से उसकी गतिविधियां बदल गई थीं. क्या सरकार ने ये जानने की कभी कोशिश की कि ये व्यक्ति पाकिस्तान क्यों गया था? आज उसे महिमामंडित किया जा रहा है."

जून 2015: "जो लोग योग का विरोध कर रहे हैं उन्‍हें भारत छोड़ देना चाहिए. जो लोग सूर्य नमस्‍कार को नहीं मानते उन्‍हें समुद्र में डूब जाना चाहिए."

अगस्त 2015: "मुस्लिमों की जनसंख्या तेजी से बढ़ना खतरनाक रुझान है, यह एक चिंता का विषय है, इस पर केंद्र सरकार को कदम उठाते हुए मुसलमानों की आबादी को कम करने की कोशिश करनी चाहिए."

फरवरी 2015: "अगर उन्हें अनुमति मिले तो वो देश के सभी मस्जिदों के अंदर गौरी-गणेश की मूर्ति स्थापित करवा देंगे. आर्यावर्त ने आर्य बनाए, हिंदुस्तान में हम हिंदू बना देंगे. पूरी दुनिया में भगवा झंडा फहरा देंगे. मक्का में ग़ैर मुस्लिम नहीं जा सकता है, वैटिकन में ग़ैर ईसाई नहीं जा सकता है. हमारे यहां हर कोई आ सकता है."

अगस्त 2014: लव जेहाद' को लेकर योगी का एक वीडियो सामने आया था. इसमें वे अपने समर्थकों से कहते सुनाई दे रहे थे कि हमने फैसला किया है कि अगर वे एक हिंदू लड़की का धर्म परिवर्तन करवाते हैं तो हम 100 मुस्लिम लड़कियों का धर्म परिवर्तन करवाएंगे. बाद में योगी ने वीडियो के बारे में कहा कि मैं इस मुद्दे पर कोई सफ़ाई नहीं देना चाहता.
*बीबीसी हिंदी
1999 में महराजगंज के पचरुखिया में क़ब्रिस्तान और श्मशान की ज़मीन को लेकर होने वाले विवाद में फायरिंग के दौरान एक गार्ड और पुलिस कांस्टेबल की मौत हो गई है. इस मामले में बिष्ट के खिलाफ केस दर्ज हुआ।  

जनवरी 2007 में एक युवक की हत्या के बाद हिन्दू युवा वाहिनी कार्यकर्ताओं द्वारा सैयद मुराद अली शाह की मज़ार में आग लगाने की घटना के बाद हालात बिगड़ गए और प्रशासन को कर्फ़्यू लगाना पड़ा. रोक के बावजूद योगी द्वारा सभा करने और उत्तेजक भाषण देने के कारण उन्हें 28 जनवरी 2007 को गिरफ़्तार कर लिया गया. क़ाबिले ज़िक्र है कि उनको गिरफ़्तार करने वाले डीएम और एसपी को दो दिन बाद ही मुलायम सरकार ने सस्पेंड कर दिया. 

कुशीनगर ज़िले में साल 2002 में मोहन मुंडेरा कांड हुआ, जिसमें एक लड़की के साथ कथित बलात्कार की घटना को मुद्दा बनाकर गांव के 47 अल्पसंख्यकों के घर में आग लगा दी गई. ऐसी घटनाओं की एक लंबी फ़ेहरिस्त है लेकिन किसी में बिष्ट के ख़िलाफ़ न तो रिपोर्ट दर्ज हुई, न उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई हुई.
प्रदेश में बसपा, सपा की सरकार रहते हुए भी उनके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई नहीं हुई क्योंकि कोई भी न्याय नहीं करना चाहता बल्कि सब एक हथियार या मौके की तरह से योगी जैसे लोगों का इस्तेमाल इलेक्शन में करते रहते हैं। इस तरह आसानी ये रहती है कि लोग डर कर वोट करते हैं और कोई सवाल भी नहीं पूछता कि पिछले पांच सालों में तुम ने क्या किया है? इन दल्ले दलों को दलदल में समाधि देकर नयी कश्ती, नयी आंधी और नया तूफान पैदा करने की ज़रूरत है. 

दलाल मौलवी और मुल्लों को ख़बरदार किया जाता है कि वो रोज़ी रोटी के लिए कोई और काम ढूंढ लें वरना  जो वो करेंगे ۔۔۔खुद ही भरेंगे. 

लखनऊ में आयोजित सातवें कॉमनवेल्थ पार्लियामेंट्री एसोसिएशन इंडिया रीजन कॉन्फ्रेंस के सांस्कृतिक कार्यक्रम में प्रोग्राम रंग-ए-इश्क़ के दौरान म्यूज़िक अचानक बंद करके कव्वाली पर परफ़ॉर्म करने से रोक दिया गया. अधिकारियों ने बोलना शुरू कर दिया कि यहां कव्वाली नहीं चलेगी. ये सरकारी कार्यक्रम है. ये और बात है कि आर्टिस्ट मंजरी चतुर्वेदी ने स्टेज से ही पुर ज़ोर कहा कि ये उनके ये प्रोग्राम का हिस्सा है और वो गंगा जमुनी तहजीब की पक्षधर और प्रचारक हैं।
नफरत की इंतेहा देखिए कि वो म्यूज़िक में भी धर्म देखते हैं। दादरा, ठुमरी, यमन, दरबारी और कल्याणी आदि धुनें भी हिन्दू मुस्लिम होती हैं। काश इन्हें कोई बताए कि हिंदी और उर्दू जब जुबान बनने की प्रक्रिया में थे तो इन में शायरी की दाग बेल अमीर खुसरो ने ही डाली थी...
ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराय नैनाँ बनाए बतियाँ 
कि ताब-ए-हिज्राँ नदारम ऐ जाँ न लेहू काहे लगाए छतियाँ 

...तबला समेत कई साज़ और धुनें खुसरो ने ईजाद की थीं. इतनी ही अकड़ है तो हर जगह (मंदिर और भजनों  समेत) रागों और साज़ों पर प्रतिबंध लगाओ. 

हमें नहीं भूलना चाहिए कि बिष्ट वही हिंदुत्व के धर्मगुरु हैं जिन्होंने ने अल्पसंख्यकों की औरतों को क़ब्रों से निकाल कर ब्लातकार करने के लिए प्रेरणादायक बयान दिया था. 

बीजेपी में तरक़्क़ी पाने के लिए सिर्फ मुसलमानों से नफरत, उन्हें बड़ी तादाद में क़त्ल करना ही काफी है. आज भी बीजेपी के पास कोई अर्थशास्त्री नहीं है जो इन्फ्लेशन (मुद्रास्फीति) को कंट्रोल कर सके. इन्हें इकॉनमी से कुछ लेना देना है भी नहीं. रोटी कपड़ा और माकन ये अर्बन नक्सल का मुद्दा है. इन का मुद्दा सिर्फ एजंडा है. चंद लोगों का एजंडा जो भारत को मनुवादी हिन्दुस्थान बना दे. 
उत्तर प्रदेश पुलिस का चरित्र हमेशा से ही छटे गुंडों का ही रहा है लेकिन फ़िलहाल जो उत्तेजना लखनऊ और इटावा में देखने को मिल रही है वो बाबा योगी की वजह से ही है. पुलिस और बाबा को संविधान के बारे में कुछ भी बताने से कोई फायदा नहीं है मगर दोनों ये जान लें कि जो भी सैलेरी उन्हें मिल रही है वो जनता के टैक्स से आता है. उत्तर प्रदेश पुलिस क्या जनता से लड़ने पर उतारू है? क्या वो जनता से लड़ सकती है?? 
हमें याद रखना चाहिए कि जनरल डॉयर के साथ जो पुलिस थी वो भारतीय ही थी...इसी पुलिस ने अपने ही लोगों पर जलियान वाला बाग़ में गोलियां चलायी थीं. अगर सारे के सारे पुलिस वाले 'न' कह देते तो पुलिस वालों की इतनी बड़ी तादाद थी कि उन के खिलाफ कोई करवाई नहीं हो सकती थी.
 

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ... 2016 के बाद डाटा ही जारी नहीं किया गया। इंडिया टुडे में छपे एक लेख के मुताबिक अब क्राइम रिकॉर्ड के डाटा में भी हेरा फेरी कर दी गई है। नेशनल  क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो गृह मंत्रालय केेे अंतर्गत  काम करता है। अब यहां भी बनियागीरी शुरू  हो चुकी है। अगर कोई घटना होती है जिसमें अपहरण, बलात्कार, मर्डर और लाश जलाया जाना (सबूत मिटाने की कोशिश) शामिल हैं तो ये चार केस बनते हैं मगर Principal Offence Rule (POR) के मुताबिक ये सब एक ही केस माना जाएगा। गृहमंत्री देेश का सबसे बड़ा बनिया है।

फिर भी एनसीआरबी के मुताबिक़ यूपी ने टॉप किया है। यहां महिलाओं के खिलाफ सबसे ज़्यादा क्राइम हुए हैं। 

बाबा बिष्ट उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश तो बना नहीं सकते कयोंकि उनमे ऐसा कुछ है ही नहीं फ़िलहाल हमारी उनसे यही अपील है कि वो यूपी को एक मठ की तरह नहीं बल्कि एक प्रदेश की तरह चलायें. आज वो जिस कुर्सी पर बैठे हैं वो किसी की बपौती नहीं है. कल वो नहीं तो ...कोई और होगा. 

आखिरी बात
अगर भगवा हटा कर सिर्फ एक आम आदमी के तौर पर अजय सिंह बिष्ट उर्फ़ बाबा योगी आदित्य नाथ को देखें जिन पर हत्या समेत कई मुक़दमे दर्ज हैं तो आप को वो एक छटे हुए गुंडे (मुजरिम) की तरह नज़र आएंगे. बड़े फ्रेम में देखिये और मुझे बताइये कि तालिबान और योगी में क्या फ़र्क़ है? इतिहास गवाह है...धर्म की आड़ में हमेशा से यही होता आया है और होता रहेगा।

एक बाबा होने के नाते बिष्ट जी को बीवी और बच्चों यानि परिवार का कोई तजुर्बा नहीं है. यही वजह है कि गोरखपुर और सहारनपुर में हज़ारों बच्चे मर गए मगर उनके माथे पर बल तक नहीं आया. घर-ग्रहस्ती चलाने में क्या दिक़्क़ते आती हैं इन्हे कुछ अंदाज़ा है न होगा. वो महिलाएं जो हिन्दू-हिन्दू की रट में लीन हैं उन्हें सोचना चाहिए कि हिन्दू-हिन्दू के बाद उन्हें दोबारा घरों में क़ैद होना पड़ेगा. उन्हें देवी तो माना जायेगा मगर इंसान हरगिज़ नहीं.

टॉप टेन VPN ने कहा है कि भारत, सूडान और इराक के साथ, दुनिया के उन तीन शीर्ष देशों में शामिल है जिन्होंने सबसे ज़्यादा इंटरनेट बैन किया है। हिन्दुस्तान ने 2019 में कुल चार हज़ार 196 घंटे इंटरनेट बंद रखा और जिसके कारण उसे 3.1  बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ. आज की बड़ी खबरों में है कि डेमोक्रेसी इंडेक्स में भारत 10 पॉइंट्स नीचे (41से 51पर) आ गया है. 
...साफ है कि बीजेपी-आरएसएस को हिन्दू-मुस्लिम का मुद्दा चाहिए कयोंकि अब राम मंदिर का रास्ता साफ हो गया है और इस बात से इन्हें सब से ज़्यादा नुकसान हो रहा है. हिन्दू का 'ह' और मुस्लिम का 'म' मिलाकर 'हम' होता है...हम भारत के लोग हैं. हमारी सभ्यता हर दौर के लिए प्रकाश का उत्सव है... 
CAA2019+NRC+NRP= Divide and Rule की क्रोनोलॉजी हर भारतीय समझ चुका है। अब कुछ नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट भी जन भावना को नज़र अंदाज़ नहीं कर सकता. लोकतंत्र में इलेक्शन और सिलेक्शन सब कुछ जनता के हिसाब से ही होता है और जनता CAA2019+NRC+NRP= Divide and Rule के खिलाफ है। 
हिन्दू-मुस्लिम एकता को नागपुर के नाग ने ऐसा डस लिया है कि ज़हर कम होता नज़र नहीं आता...बाद अज़ तमाम... इरफ़ान सिद्दीक़ी का ये शेर बहुत फिट बैठेगा ...

अजब हरीफ़ था मेरे ही साथ डूब गया 
मिरे सफ़ीने को ग़र्क़ाब देखने के लिए_इरफ़ान सिद्दीक़ी

@MobeenJamei

Saturday, January 18, 2020

#NewNazm #JMI

#IndianDaughterSafoora


ये नज़्म जब संविधान बचाने के लिए सीएए का प्रोटेस्ट कामयाबी से लोकतंत्र को मज़बूत कर रहा था...उसी दौरान लिखी गयी थी. अब जबकि सीएए प्रोटेस्ट में शामिल लोगों को एक एक करके फ़र्ज़ी केस में जेलों में डाला जा रहा है और महिला एक्टिविस्ट सफूरा ज़रगर के खिलाफ UAPA  के तहत करवाई हुई है जो कि सरासर क़ानून का ग़लत और मनमाना इस्तेमाल है और लोकतंत्र को खोखला करने की साज़िश भी है...सफूरा के हवाले से निम्नस्तर की घटिया भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है कि शर्म भी शर्मा जाये....तो एक बार फिर आप की खिदमत में पेश है... 

दुख़तराने जामिया तुम पर बहुत है इफ़्तिख़ार
सरफ़रोशाने अलीगढ़ जान-ओ-दिल तुम पर निसार
तुमने ज़ालिम को‌ किया है कुल जहां में शर्मसार
अब तुम्हारी सरफ़रोशी हश्र तक है यादगार

तुम हुए सीना-सिपर ज़ुलम-ओ-सितम के सामने
वक़्त के फ़िरऔन के ख़ूनी क़दम के सामने
हक़ पसंदों को क्या महमेज़ है इस काम ने
क़ौम के मर्द-ओ-ज़नां आए हैं तुमको थामने

आएगी इन काविशों से हिंद में फ़स्ले बहार
दुख़तराने जामिया तुम पर बहुत है इफ़्तिख़ार

डॉक्टर अहमद मुज्तबा सिद्दीकी

दुख़तराने जामिया के हौसलों को है सलाम
ज़ालिम-व-सरकश के मुँह पर कस दिया तुमने लगाम
सफ्ह-ए-तारीख़ में ऊंचा तुम्हारा है मक़ाम
फ़ख्र तुम पर क़ौम के हर फ़र्द को होगा मुदाम

पंज-ए-ज़ोर--सितम को कर दिया है ख़ाकसार
दुख़तराने जामिया तुम पर बहुत है इफ़्तिख़ार

तख़्त से फ़िरऔन का भी हमने देखा है सितम
और हिटलर ने बनाया था जो दस्तूर-ए-अलम
हिंद पर अंग्रेज़ का वो ज़ुल्म वाला हर क़दम
फिर तबाही नामुरादी से खुला सब का भरम

कब्ज़-ए-ज़ुलम-ओ-जफ़ा आख़िर कहाँ है पाएदार
दुख़तराने जामिया तुम पर बहुत है इफ़्तिख़ार

जो बुलंदी पर गया है आएगा उस को ज़वाल
सलतनत हरदम रहेगी है कहाँ उस की मजाल
हर किसी इन्सान को लाज़िम है करना इंतिक़ाल
बरतरी पर बस रहेगी ज़ात है जो ज़ुल-जलाल

सुन ले ज़ालिम अब तेरा ये ख़त्म होगा इक़तिदार
दुख़तराने जामिया तुम पर बहुत है इफ़्तिख़ार

अफ़रोज़ आलम चिरैयाकोटी Sir

जल रहा है मुल्क देखो चार-सू है इज़तिराब
बे-गुनाहों‌ पर ही तेरा चल रहा है क्यों इताब
अब उन्ही बेचैनियों से जन्म लेगा इन्क़िलाब
ज़ुलम की सब साज़िशें हो कर रहेंगी बे-नक़ाब

फिर तेरा हर इफ़्तिरा-ओ-झूट होगा आशकार
दुख़तराने जामिया तुम पर बहुत है इफ़्तिख़ार

ज़ुलम का तेरा भी आख़िर आएगा अब इख़तिताम
तू ने देखा ही नहीं आहों का अब तक इंतिक़ाम
आज सड़कों पर जो तू ने कर दिया है इज़दिहाम
अब यहीं से आएगा तेरी तबाही का पयाम

फिर तेरा रह जाएगा बर्बाद क़ौमों में शुमार
दुख़तराने जामिया तुम पर बहुत है इफ़्तिख़ार

कोमल है कमज़ोर नहीं...https://abirti.blogspot.com/2019/12/caaprotests.html?m=1

तुमको क्यों तालीम-गाहों से हुई है दुश्मनी
है सितमगरों से तेरी किस लिए ये दोस्ती
तालिब-ए-इलमों की तुमने छीन ली है सादगी
दहर में होगी नहीं फिर अब ये तेरी धांदली

शान-ओ-शौकत अब तेरी होगी जहां में तार-तार
दुख़तराने जामिया तुम पर बहुत है इफ़्तिख़ार

अब तो लाज़िम है कि सारे हमवतन बोला करें
तेरे हर इक झूट को दुनिया में हम इफ़शा करें
तेरी ख़ूनी साज़िशें नाकाम हर लम्हा करें
दूर अपने मुल्क से हम ज़ुल्म का क़बज़ा करें

और अमन-ओ-आश्ती इस में करें हम उस्तवार
दुख़तराने जामिया तुम पर बहुत है इफ़्तिख़ार

क्यों डराते हो...! https://abirti.blogspot.com/2019/12/blog-post_19.html?m=1

अब इरादा है यही दिलशाद हम रुकते नहीं
सरफ़रोशी का है जज़बा हम कभी झुकते नहीं
पंज-ए-ज़ालिम के आगे सर कभी रखते नहीं
हम वतन के वास्ते मरने से भी डरते नहीं

अब हमारी फ़तह तक काविश रहेगी बरक़रार
दुख़तराने जामिया तुम पर बहुत है इफ़्तिख़ार

नोट: अगर किसी शब्द का अर्थ जानना जो तो कमेंट करें, जवाब में बता दिया जायेगा.

ताक़त का नंगा नाच #JNU #Nazm... https://abirti.blogspot.com/2020/01/jnu.html?m=1

दुख़तराने जामिया: जामिया की छात्राएं 
इफ़्तिख़ार: गौरव, फ़ख्र
सरफ़रोशाने अलीगढ़: अलीगढ़ के जयाले, बाहदुर छात्र
सीना-सिपर: डट जाना
फ़िरऔन: क्रूर शासक 
महमेज़: बढ़ावा देना
मर्द-ओ-ज़नां: मर्द औरत
काविशों: कोशिशों
 फ़स्ले बहार: बहार की फ़सल
दुख़तराने जामिआ तुम 
सरकश: नाफरमान, झूटा वादा करने वाला
सफ्ह-ए-तारीख़: इतिहास का पन्ना
मुदाम: हमेशा
पंज-ए-ज़ोर-व-सितम: ज़ुल्म का पंजा
ख़ाकसार: खाक में मिला हुआ
दस्तूर-ए-अलम: ज़ुल्म का क़ानून 
पाएदार: मज़बूत, टिकाऊ 
ज़वाल: डूबना, ख़त्म होना 
मजाल: हिम्मत 
ज़ुल-जलाल: अल्लाह, रब 
इक़तिदार: हकूमत, सरकार
इज़तिराब: बेचैनी
इताब: सज़ा, सताना 
इफ़्तिरा: झूट गढ़ना
आशकार: ज़ाहिर होना
इख़तिताम: खत्म होना 
इंतिक़ाम: बदला लेना 
इज़दिहाम: भीड़ लगना 
पयाम: पैग़ाम, सन्देश 
तालीम-गाहों: जहाँ शिक्षा दी जाये
सितमगरों: सितम ढाने वाले 
तालिब-ए-इलमों: छात्र-छात्रा 
दहर: ज़माना 
इफ़शा: ज़ाहिर करना 
उस्तवार: क़ायम करना 
दिलशाद: दिल खुश करने वाला, दिलखुश 

रचनाकार: दिलशाद मिस्बाही छात्र #AMU
यूं बे-हिसी के दाग़ मिटाता चला गया
आता रहा जो दिल में सुनाता चला गया
@MobeenJamei

Wednesday, January 15, 2020

#NewNazm JNU

जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू), दिल्ली के स्टूडेंट्स के नाम
 
हम अपने वतन की ज़ीनत हैैं 
हम अहले क़लम की चाहत हैं
हम मजबूरों की हिम्मत हैं
हम मजदूरों की ताक़त हैं

बातिल से आँख लड़़ाते हैं
ज़ालिम पे बर्क़ गिराते हैं 
हाकिम भी यहाँ थर्राते हैं
कुछ ऐसी यहाँ की शोहरत है...
हम अपने वतन की ज़ीनत हैैं 

सब खेतों की, खलयनों की
कोहसारों की, मैदानों की
आवाज़ है ये दीवानों की
दामन में इस के उसअत है...
हम अपने वतन की ज़ीनत हैैं 

आईन से रिश्ता रखना है
क़ानून का सिक्का चलना है
संघर्ष इसी पे करना है
अब मुल्क की रखना इज़्ज़त है...
हम अपने वतन की ज़ीनत हैैं 

दहक़ान से अपनी यारी है
मज़लूम का पल्ला भारी है
बस आज़ादी ही प्यारी है
बस यही तो अपनी दौलत है...
हम अपने वतन की ज़ीनत हैैं 

हम दश्तो दमन पर गरजेंगे
हम गंगो जमन पर बरसेंगे
हम गुलशन गुलशन महकेंगे
ये तुझ से वादा भारत है...
हम अपने वतन की ज़ीनत हैैं 

है ख़ल्क़े खुदा का नक़्क़ारा
इंसाफ का है ये गहवारा
है हक़ का यहाँ पे नज़्ज़ारा
बातिल को यहाँ से वहशत है...
हम अपने वतन की ज़ीनत हैैं 

मज़दूर यहाँ मजबूर यहाँ
हर ज़ुल्मो जफ़ा से चूर यहाँ
हर बेबस है मसरूर यहाँ
मशहूर यहाँ की जुरअत है...
हम अपने वतन की ज़ीनत हैैं 

है हिम्मत वाला जेएनयू
है इज़्ज़त वाला जेएनयू
है जुरअत वाला जेएनयू
ये अहले जुनूँ  की तलअत है... 
हम अपने वतन की ज़ीनत हैैं 

रचनाकार: डॉक्टर अहमद मुज्तबा सिद्दीकी 
भूगोल संकाय, एएमयू
*उसअत = कुशादगी, फैलाव, बड़ा होना
*आईन = संविधान
*दहक़ान = किसान
*ख़ल्क़े = जनता
*वहशत = डर
*मसरूर = खुश
*जुरअत = हिम्मत
*अहले जुनूँ = जुनूून वाले, कर गुजरने वाले
*तलअत = उदय होना, चमकना, नया सवेरा

#शाहीन_बाग़_के_नाम #IndiaAgainstCAA_NRC_NRP

NAZM #AMU_JMI

Sunday, January 12, 2020

#NRC: शहद दिखाए ज़हर पिलाए

Published in monthly "Kanzul Iman" Feb 2020 New Delhi. This article is talking about the historical background of NRC and its economic impact on our nation "India".
मासिक "कंज़ुल ईमान" फरवरी 2020 नई दिल्ली में प्रकाशित यह लेख NRC के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और हमारे हृदय राष्ट्र "भारत" पर उसके आर्थिक प्रभाव के बारे में बात कर रहा है।
Spacial Thanks
Editor Zafaruddin Sir and Kanzul Iman team. 

Thursday, January 9, 2020

#JNU

ताक़त का नंगा नाच


5 जनवरी 2020 की शाम लहू से स्याह हुई। दिल्ली ने कभी इस तरह का हमला नहीं देखा था कि मुंह में राम बगल में छूरी' हो...भविष्य के रौशन दीप को ज़ुल्म और ज़ोर ज़बरदस्ती से बुझाने की कोशिश की गई हो और रक्षक, मूक दर्शक बन गया हो। खून में लतपथ भारत की बेटियों की चीखें बुलंद हो रही हों...और मदद को जो लोग दौड़ पड़े हों और उन्हें रोक कर बेबस कर दिया गया हो... उन पर भी हमला कर दिया गया हो। 

इतना भी मत डराओ कि दर ही खत्म हो जाए!
'बईलट' दिल्ली पुलिस ने गुलामी का सबसे बड़ा उदाहरण पेश किया कि जो लोग हमले का शिकार थे उन्हीं के खिलाफ केस दर्ज कर लिया। आगे भी "लो...या" के खयाल से ही फैसला सुरक्षित रख लिया जाएगा।

डॉक्टर ए पी जे अब्दुल कलाम ने कहा था कि सूरज की तरह चमकने के लिए सूरज की तरह जलना भी होगा। भारत के तमाम संवैधानिक संस्थाओं को सोचना होगा कि डेवलप्ड कंट्री बनने के लिए वहां की संस्थाओं की तरह काम करना होगा। अमेरिका की सनस्थाएं और ट्रंप के बीच टकराव जगज़ाहिर है। मीडिया और ट्रंप की बेनाम जंग से हर कोई वाकिफ है। भारत की संस्थाएं क्लियर करें की उन्हें ज़हनी गुलामी और डर से कब नि निकालना है?
तुम सुनो या न सुनो हाथ बढ़ाओ न बढ़ाओ
डूबते डूबते इक बार पुकारेंगे तुम्हें _इरफ़ान सिद्दीक़ी

बहुत हद तक सोशल मीडिया और कुछ वेबसाइट्स ने  जेएनयू अटैक की हकीकत पूरी दुनिया के सामने रख दी है लेकिन सबसे भरोसेमन्द यहां का मीडिया अब अलग अलग नैरेटिव गढ़ रहा है।कल और परसों जेएनयू के वीसी एम जगदीश ने केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय में हायर एजुकेशन के सेक्रेटरी अमित खरे से मुलाक़ात करके अलग ही राम कहानी की शुरुआत कर दी है।

फिलहाल जिस तरह जेएनयू में हो रहा है....आईआईएमसी में रहते हुए मैं ने करीब से देखा है। यही ट्रेंड है। पहले रोका जाता है फिर पैरेलल स्टूडेंट्स खड़े कर दिए जाते हैं। फीस, लाइब्रेरी आदि सुविधाओं की मांग तमाम स्टूडेंट की मांग है बस कोई उलझना नहीं चाहता।" तंग आमद ब जंग आमद"  आखिर! सभी विद्यार्थी अपनी अपनी क्लासेज़ छोड़कर आन्दोलन का हिस्सा बन जाते हैं...आन्दोलन कामयाब हो जाता है। फिर आन्दोलन का विरोध करने वाले  चाटुकार विद्यार्थी, प्रोफेसर और एडमिनिस्ट्रेशन मुंह छुपाते फिरते हैं। जेएनयू में टेरर अटैक इसीलिए मुंह छुपाकर किया गया। यहां भी यही होगा। जिस तरह हमले से पहले मुंह पर नकाब था उसी तरह जिंदगी भर मुंह छुपाते फिरेंगे।... कुछ हो ना हो दिल तो जरूर काला पड़ जाएगा।

बीसवीं शताब्दी महिलाओं की सदी है। हाल फिलहाल के जो भी आन्दोलन चल रहे हैं उन का नेतृत्व महिलाएं कर रही हैं।  

एक साल तक आईआईएमसी में पढ़ाई की, चूंकि यहां लड़कों के लिए हॉस्टल कि सुविधा बंद कर दी गई थी जो आन्दोलन के बाद आइंदा साल बहाल कर दी गई, मैं यकीन से कहता हूं अगर जेएनयू ना होता तो शायद मेरी पढ़ाई की दिशा और दशा कुछ और होती। 
जेएनयू के नाम एक तुकबंदी की है क्योंकि कविता या शायरी मेरे बस की बात नहीं। आप भी देखिए अच्छा लगे तो आगे बढ़ाइये। 


#JNU
जेएनयू है सख्त जान, जान लो
हारे हो और हारोगे, मान  लो

कौन नहीं ये चाहता, किसे नहीं है ये पसंद 
आज़ादी के नारों से तुम भी अपनी शान लो 

मत खरीदो इंसानों को, ये भी तो तरीक़ा है!
प्यार करो इंसानों से, साथ इन्हें बेदाम लो 

कब तक और कितना गढ़ोगे नैरेटिव पे नैरेटिव
ये बेकार की मेहनत छोड़ो, माफी हमसे दान लो 

बाबर बाबर करते करते हिंदू-मुस्लिम खूब किया
एक बार तो अपने मुंह से अंग्रेज़ों का नाम लो

असली मुमद्दे असली मांग रोटी कपड़ा और मकान
मन में  देश के, हिन्दू मुस्लिम चाहे जितना सान लो 

हम तो लड़ेंगे, जीतेंगे भी, देखते रह जाओगे 
बद निय्यत हो, हारोगे कुछ भी अब तुम ठान लो

@MobeenAhmad

Tuesday, January 7, 2020

"हम बोलेंगे" #JMI_AMU_JNU #IndiaAgainstCAA_NRC_NRP

"हम बोलेंगे"
लाज़िम है कि हम भी बोलेंगे

जब हाकिम ज़ालिम बन जाए
वहशत का बादल तन जाए
दहशत में पूरा दिन जाए
नामूस ए निस्वां छिन जाए
तब बोलना हम पे लाज़िम है
"हम बोलेंगे"
लाज़िम है कि हम भी बोलेंगे

जब धर्म के पत्ते उछलने लगे
जम्हूरी निज़ाम बदलने लगे
बू-जहल के वारिस फिरने लगे
और इलमी मराकिज़ जलने लगें
तब बोलना हम पे लाज़िम है
"हम बोलेंगे"
लाज़िम है कि हम भी बोलेंगे

इस खाक ए वतन को लहू अपना
सद शौक़ दिया है किस ने सदा ?
सौ जां से है इस पे कौन फिदा
मशकूक हमारी क्यों है वफा!
अब बोलना हम पे लाज़िम है
"हम बोलेंगे"
लाज़िम है कि हम भी बोलेंगे

ये ज़ुल्मो सितम होगा कब तक!
देंगे वो हमें धोका कब तक!
कुढ़ कुढ़ के बता! जीना कब तक! 

लेंगे न हम हक अपना कब तक!

अब बोलना हम पे लाज़िम है
"हम बोलेंगे"
लाज़िम है कि हम भी बोलेंगे

ये वक़्त नहीं है डरने का
ये वक़्त है डटकर रहने का
कुछ खौफ नहीं कट मरने का
हां! वक़्त है जमकर लड़ने का
अब बोलना हम पे लाज़िम है
"हम बोलेंगे"
लाज़िम है कि हम भी बोलेंगे

इक रोज़ इस रात को ढलना है
दीप अमनो वफा का जलना है
इंसाफ में सबको तुलना है
आज़ादी तो इक दिन मिलना है
फिर चुप साधे क्यों रहना है
अब बोलना हम पे लाज़िम है
"हम बोलेंगे"
लाज़िम है कि हम भी बोलेंगे...

✍️New Nazm written by अफ़रोज़ आलम चिरैयाकोटी Sir