Wednesday, February 26, 2020

ना जायज़ सरकार

#DelhiRiots2020 CM HM PM 

याद कीजिए! जब अचानक सभी टूरिस्टों और दूसरे राज्य के तमाम लोगों को ये कहकर कि खुफिया एजेंसियों ने अलर्ट किया है कि कोई बड़ा आतंकवादी हमला होने को है ' अल्टीमेटम दिया गया कि सभी लोग कश्मीर जल्द अज़ जल्द छोड़ दें...फिर आपने देखा...वो बड़ा हमला 'कश्मीर के विशेष राज्य के दर्जे को छीन कर' किया गया. जिस दिन पार्लियामेंट में आर्टिकल 370 को निष्क्रिय (एक तरह से खत्म) किया गया उसी के दूसरे दिन इंडियन एक्सप्रेस में अशोका यूनिवर्सिटी के पूर्व वीसी और इंडियन एक्सप्रेस के कॉलमनिस्ट भानु प्रताप मेहता ने लिखा था कि ये कश्मीर का इंडियानाईज़ेशन तो नहीं है, हां! ये पूरे इंडिया का कश्मीराईज़ेशन ज़रूर है.
हाल ही में अलीगढ़ जाना हुआ, यूनिवर्सिटी कैंपस में इस क़दर फोर्स थी और इंटरनेट बंद था...मानो कि हम कश्मीर आ गए हों? इंटरनेट के बग़ैर रह पाना बहुत मुश्किल है. अलीगढ़ के पुराने शहर ऊपर कोर्ट में उन महिलाओं पर पथराव हुए जो शांतिपूर्ण ढंग से धरने पर बैठी थीं और सब कुछ ठीक चल रहा था. अब क्या है कि हर आदमी यहां गांधी तो नहीं है इसलिए प्रतिक्रिया में दोनों तरफ से पथराव होने लगे. रैपिड एक्शन फोर्स (आर ए एफ) और पुलिस भी उन पत्थर बाजों के साथ खड़ी नज़र आयी जो प्रदर्शनकारियों पर पथराव कर रहे थे. ये कोई नई बात नहीं है...यही होता आया है. मगर मीडिया (हिंदी अखबार, वेबसाइट टीवी) ने जो दिखाया या जिस तरह से खबरें लिखीं वो भी उत्तेजक था. उन्होंने प्रदर्शनकारियों को विलेन (गद्दार) बना कर पेश किया...खैर ये भी नया नहीं है.
अल्पसंख्यक मुसलमानों ने आज़ादी के बाद धर्म के आधार पर उत्पीड़न इतना झेला है कि वो अपने बच्चों को बचपन से ही मानसिक रूप से तैयार कर देते हैं कि यहां तुम्हारे साथ क्या क्या हो सकता है...जो भी हो तुम्हें प्रतिक्रिया नहीं देना है। अल्पसंख्यकों की लाश को नोच नोच कर खाकर फिर उन्हीं का खून पीकर राजनीति अपनी प्यास बुझाती है, मीडिया भी साथ ही साथ रहता है. मरे हुए को बार बार मारा जाता है...
एक गर्म बकरी का मिज़ाज रखने वाला शख्स अपने भविष्य को खत्म होता देख कर बावला हो गया है. वो नफरत की पहाड़ियों पर बद हवास चढ़ता चला जा रहा है मगर उसकी बेचैनी है कि कम होने का नाम नहीं लेती. उसने  सोची समझी साजिश के तहत दंगे भड़का दिए. द हिंदू की खबर के मुताबिक अब तक लगभग 38 (आधिकारिक आंकड़ा) मौतें हो चुकी हैं. ये तादाद और भी हो सकती है क्योंकि सब रिपोर्ट नहीं हो पाते और हो भी जाएं तो सरकार दबा देती है.
दिल्ली के सीएम केजरीवाल ने इन दंगों के संदर्भ में बस इतना किया कि उन्हें दिल्ली पुलिस दे दी जाए, ठीक है दिल्ली पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत है मगर सीआरपीसी के सेक्शन 129 और 130 भी हैं जिनके मुताबिक़ एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (जिला अधिकारी) दंगाई भीड़ को खदेड़ने के लिए स्पेशल ऑर्डर जारी कर सकता है. अगर कामयाबी न मिले तो वो सिविल फोर्स (पुलिस) का इस्तेमाल कर सकता है फिर भी कामयाबी न मिले तो वो केंद्र के Armed Forces (फौज) के किसी ऑफिसर को बुला सकता है...और ये एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट दिल्ली के सीएम (केजरीवाल) को रिपोर्ट करता है. राजघाट पे नौटंकी करने के बजाए अगर वो जिला अधिकारी की रिपोर्ट पर ध्यान देते तो शायद दंगा इतना न बढ़ता. कुछ नहीं तो अपने विधायकों को बुलाकर पूर्वी दिल्ली का दौरा कर सकते थे...हर विधायक को सिक्योरिटी मिली हुई है अगर 20 विधायक और सीएम ने मिलकर शांति मार्च निकाला होता तो बात कुछ और होती...सच्ची बात ये है कि ये बहते लहू और लाश को एक मौके की तरह इस्तेमाल करके दिल्ली पुलिस की अपनी मांग को मजबूत करने में लगे रहे...सब याद रखा जाएगा. केजरीवाल सरकार की पोल तो पिछले पांच सालों में ही खुल कर सामने आ गई थी जब उसने साफ सफाई के मामले में मुस्लिम इलाकों को अपने हाल पर छोड़ दिया था, वादा करने के बावजूद मुस्लिम इलाकों में स्कूल नहीं खोले, इलेक्शन से पहले सभी भाषाओं में भर्तियां निकालीं मगर उर्दू को छोड़ दिया... फिर भी हमें लगता था कि गवर्नेंस ठीक है सो वो भी खुल कर सामने आ गया.
जैसा कि टेलीग्राफ ने सुर्खी लगाई कि '... तो गुजरात मॉडल दिल्ली पहुंच गया' यही हकीकत है. केंद्रीय गृहयुद्ध मंत्री शाह ने जान बूझ कर ढील दी, दिल्ली के बॉर्डर को सील नहीं किया, अतिरिक्त फोर्स नहीं लगाए, ऑर्डर नहीं दिया. प्रधानमंत्री को तो प्रेस कॉन्फ्रेंस भी करना नहीं आता...उनका खामोश रहना उनकी मजबूरी थी.
जमियत उलमा हिंद दंगा पीड़ितों के लिए दिल्ली के बाहर कोई नई कॉलोनी बनाने का प्रोजेक्ट तैयार करने में लगी होगी ताकि जिस ज़मीन पर दंगा पीड़ित रह रहे हैं वो किसी उद्योगपति को दी जा सके और अरबों का चंदा करके मौज उड़ाई जा सके. ये भी अपने साथियों के साथ वक़्त पर नहीं पहुंचे!

Jamiat Ahle Hadees Hind
जनता (अल्पसंख्यक) का यहां कोई नाखुदा नहीं...उन्हें कश्ती खुद ही पार लगानी है. जमीयत अहले हदीस और जमीयत उलमा हिंद समेत बड़े बड़े ठेकेदार मुल्लाओं को बताना चाहिए कि कथित तौर पर उन्होंने सऊदी गवर्नमेंट को खत क्यों लिखे कि मोदी जी को अवॉर्ड दिया जाए. अब समय आ गया है कि अल्पसंख्यक मुस्लिम जज़्बाती बातों से ऊपर उठकर खामोशी से सोच विचार करें....सारे मौलवी, सारे पीर और सारी दरगाहें एक जैसी नहीं मगर दो चंद को छोड़कर कोई भी आगे नहीं आया. ये क्रीमी लेयर (सरकारी मुसलमान) हैं. खरीद व फरोख्त इनकी असल पहचान है. 
सबसे अच्छा और आसान नुस्खा इन हालात से निबटने का यही है की अपने बच्चो और बच्चियों को हायर एजुकेशन तक पुहिंचाया जाए...चाहे आधी रोटी खा कर ही गुज़ारा करना पड़े.
अगर लोकतंत्र है...तो मोदी सरकार एक ना जायज़ सरकार है...ये कुछ नहीं कर सकी...बनी बनाई अर्थव्यवस्था को तबाह करने के बाद दूसरी 'बाबरी मस्जिद' ढूढने में लगी है...CAA ही दूसरी 'बाबरी मस्जिद' है. अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए इतना तांडव मचाया जा रहा है. ट्रंप के दौरे से क्या हासिल हुआ? सिवा इसके कि मोदी और इंडिया दो अलग अलग चीजें हैं.
देखोगे तो हर मोड़ पे मिल जाएँगी लाशें

ढूँडोगे तो इस शहर में क़ातिल न मिलेगा

मालिकज़ादा मंज़ूर


कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया
बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया
कौन रोता है किसी और की ख़ातिर ऐ दोस्त
सब को अपनी ही किसी बात पे रोना आया
किस लिए जीते हैं हम किस के लिए जीते हैं
बारहा ऐसे सवालात पे रोना आया
साहिर लुधियानवी...वो सुबह कभी तो आएगी!!

@MobeenJamei

गृहयुद्धमंत्री!
रंग भी बेरंग है क्यों
तंग से भी तंग है क्यों
आज अाई कुछ बहार
दिल मगर है बे करार
झूट की ज़ुबान भी
सच की रखे आन भी
बात हो, जुमला ना हो
कुछ भी हो, बुरा ना हो
मीडिया से बैर नहीं
मोडिया की खैर नहीं
मकतल ए इंसाफ को
अद्ल का पैग़ाम दो
नोट: ये नज़्म 12 मार्च 2020 को लिखी गई.
@MobenJamei


Thursday, February 20, 2020

हठधर्मी

झुठलर


हमारी हिंदी पत्रकारिता ही विश्वगुरु है, कयोंकि इस ने सब कुछ पहले से तै कर लिया है कि उसे क्या लिखना है۔ 


पाकिस्तान की चार दिन की यात्रा पर आए संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस से जब एक इंटरव्यू में पूछा गया कि क्या वो  भारत में नए कानून 'नागरिकता (संशोधन) अधिनियम' (CAA) को लेकर चिंतित हैं तो उन्होंने कहा, 'जाहिर तौर पर हूं। क्योंकि यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें संयुक्त राष्ट्र की संबंधित इकाई बहुत सक्रिय है।' उन्होंने कहा, 'शरणार्थियों के लिए वर्तमान उच्चायुक्त इस स्थिति को लेकर काफी सक्रिय हैं। क्योंकि इस तरह के कानून से नागरिकता जाने का खतरा पैदा होता है।'

दुनिया के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय संगठन के महासचिव के इस बयान पर नवभारत टाइम्स सुर्खी लगाता है,'CAA पर UN चीफ एंतोनियो गुतारेस का बेतुका बयान, बोले- नागरिकता जाने के खतरे पर रोक जरूरी'.https://navbharattimes.indiatimes.com/world/pakistan/necessary-to-prevent-statelessness-when-nationality-laws-are-changed-says-un-chief/articleshow/74210717.cms

आज के जो हालात हैं या आगे जो भी बनेंगे उनके लिए हिंदी पत्रकारिता (टीवी जैसे ज़ी न्यूज़, आज तक, इंडिया न्यूज़, अख़बार जैसे दैनिक जागरण, अमर उजाला और NBT) 60 फीसद ज़िम्मेदार हैं. ये वो घाघ हैं जिनकी पत्रकारिता से ज़ाहिर होता है कि वो कभी भी भारत को गाँधी के सपनों का राष्ट्र नहीं बनने देंगे.

#SupremeCourt

पिछले दो दिनों से सुप्रीम कोर्ट की तरफ से नियुक्त मध्यस्थ (Mediators) साधना रामचंद्रन और संजय हेगड़े शहीनबाग की महिला प्रदर्शनकारियों से बात कर रहे हैं. Mediators उन्हें समझा रहे हैं कि जिस तरह आपका प्रदर्शन करने का हक़ है उसी तरह अन्य शहरियों को भी यहाँ से आने जाने का हक़ है.


दूसरी तरफ प्रदर्शन करने वाली महिलाएं कह रही हैं कि हम जिन मुद्दों पर यहाँ बैठे हैं उनकी किसी को फ़िक्र नहीं, हर किसी को बस सड़क की पड़ी है.

Mediators आज फिर शहीनबाग पहुंचे. संजय हेगड़े ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के लिए बहुत आसान था कि वो पुलिस को बोल कर आप को हटवा दे लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. वो भी आपकी बात समझता है. It's my way or highway नहीं होता. शाहीनबाग हो या और कोई जगह अगर लोगों को तकलीफ़ है तो Protest होना चाहिए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट कहता है कि कल को अगर नोएडा वाले डीएनडी जाम करके बैठ जाएं तो इस तरह से देश नहीं चलेगा. सुप्रीम कोर्ट भी समझता है कि छोटे से कोर्ट रूम में सबको नहीं सुना जा सकता, इसीलिए हमें भेजा गया.

उन्होंने कहा कि आपके हाथ में इतिहास है, आपके हाथ में फ़ैसला है. जहां औरतों का बोलबाला होता है... वही देश आगे बढ़ता है. आपसे गुजारिश है कि आप ये बताइए कि आगे मामला कैसे बढ़ सकता है?


मेरे ख्याल में सुप्रीम कोर्ट 21वीं शताब्दी में बैलगाड़ी की सवारी कर रहा है. सीधी सी बात है, देश चलाने की ज़िम्मेदारी सरकार की है. सुप्रीम कोर्ट का काम नागरिक के अधिकारों (संविधान) की रक्षा करना है, न्यायपालिका चलाना है. अगर इतना ही ज़रूरी है तो वो पहले डे टू डे हेयरिंग शुरू करके CAA पर अपना फैसला सुनाये.

2014 से पहले सुप्रीम कोर्ट काफी सो मोटो नोटिस लिया करता था मगर अब...कम से कम पहले कोई भी मामला  सुप्रीम कोर्ट जाता था तो जब तक फैसला न हो जाए स्टे लग जाया करता था मगर अब...चाहे वो आर्टिकल 370 हो या फिलहाल एनपीआर, CAA या एनआरसी का मामला हो... कहीं भी ऐसा कुछ नज़र नहीं आया! सुप्रीम कोर्ट ने ही NRC के मामले में अपने एक आदेश में बर्डेन ऑफ प्रूफ़ सरकार से हटा कर जनता पर डाल दिया था. स्टेट बनाम सिटिज़न की लड़ाई में ये ऐसा ही हो गया कि ' एक तो करेला दूसरा नीम पर चढ़ा.'

सुप्रीम कोर्ट पर बड़े संगीन सवाल खड़े किये जा चुके हैं. फिलहाल उसका रवैया समझ से बाहर है, अगर उसे अपनी साख की कुछ परवाह है तो ये उसे अपने कर्तव्य से साबित करना चाहिए.

शहीनबाग आंदोलन शुरू हुए आज 68 दिन हो गए. सरकार या उनका कोई नुमाइंदा उनसे बात करने तक नहीं गया. सरकार के रवैये से ये प्रतीत हो रहा है कि ये सभी भारतीय है ही नहीं.


पीएम मोदी और उनके ग्रहमंत्री कह रहे रहे हैं कि CAA पर दोबारा विचार करने का सवाल ही नहीं...CAA पर हम एक इंच पीछे नहीं हटेंगे.

इस तरह के बयानों का क्या मतलब है? ये संविधान के अनुरूप लोकतंत्र में चुने हुए नेता हैं? इन की हठधर्मी बताती है कि ये मनुस्मृति से आत्ममुग्ध हैं।
सवाल ये है कि इन्हें बार बार ये बयान देने कि ज़रूरत क्यों पड़ रही है? 

ये गांधी के देश में आज भी गांधी को नहीं हरा सकते. गांधीवादी सत्यग्रह का न कोई तोड़ है न होगा। और ये जारी रहा तो जैसे CAA2019+NRC+NRP= Divide and Rule लाया गया वैसे ही वापस लिया जायेगा। 

अर्थव्यवस्था पीएम मोदी और उनकी पूरी टीम की काबू से बाहर हो चुकी है। फिलहाल कहा जा रहा है कि जितना नुकसान हो चुका है उसी की भरपाई में लगभग 25 साल लग जाएंगे मगर मौजूदा सरकार की हठधर्मी देखते ही बनती है क्योंकि वो कुछ भी सुनने, या मानने को तैयार ही नहीं। ऐसे में जबकि सरकार आरबीआई से पैसे ले ले कर काम चला रही है अगर एनआरसी लागू होता है तो भूखमरी से पहले ही जूझ रहे  देश का भट्टा बैठ जाएगा।

गौर कीजिए! असम की आबादी तीन करोड़ 12 लाख है. एनआरसी की प्रक्रिया में 50 हज़ार कर्मचारी लगाए गए और अनुमानित सरकारी खर्च 1600 करोड़ रुपए आया. जनता ने जो खर्च किया वो गिनती में नहीं है। अगर यही प्रक्रिया पूरे देश में लागू होती है तो पूरे देश की आबादी लगभग 130 करोड़ है जिन पर 250 लाख करोड़ रुपए का अनुमानित खर्च आएगा जो आगे बढ़ भी सकता है। इस लिए सीएए का विरोध जरूरी है। ये संविधान की मूल भावना (प्रस्तावना) के खिलाफ है.

@MobeenJamei


Thursday, February 13, 2020

Nazm #Modi #budget2020 #CAAProtest

Ghar Ko Chhoda... 


घर को छोड़ा गांव से बिछड़े वहशत के फनकार हुए 
मजलूमों से बैर रखा और ज़ालिम उनके यार हुए

चक्कर देश विदेश के काटे फिर भी सफलता मिल न सकी 
अर्थव्यवस्था क्या सुधरेगी अहले हुनर बेकार हुए

डेटा लिया विकिपीडिया से इकनोमी सरवे में कहा 
हिन्द के गोरबा को छोड़ो अब गोरबा बे शुमार हुए

अपनी कमी पर पर्दा डाला औरों के ऐब गिनाते गए 
जिस जिस ने आवाज़ उठाई देश के सब गद्दार हुए

कहता है इतिहास ये हमसे गुजरा हुआ कल याद रखो
आपस में जो लड़ते रहे वो मफ्तूहे तातार हुए

नफसी नफ़सी के आलम में हश्र बपा है सब के लिए  
उलमा मशाइख़ मुंह को छुपाए खाम खा शर्मसार हुए

वक़्त पे काम जो आए न उस से बैअत बंद करो
खाली पीर कहलाने वाले मुरशिद ऐसे हज़ार हुए 

जंग प्यादे ही लड़ते हैं छोड़ो कयादत का चक्कर 
सोने दो काएद को छोड़ो तुम, हम तो अब बेदार हुए 

हाल हमारा देख के गैरों को भी तरस आया हम पर
अहले क़लम ने देखा तमाशा अहले सितम ग़मखार हुए

क्या गुजरी और कैसी गुजरी क्या क्या लिखे ये तेरा मुबीं 
गीत सुहाने भूल गए सब जाने क्या आज़ार हुए

گھر کو چھوڑا، گاؤں سے بچھڑے وحشت کے فنکار ہوئے
مظلوموں سے بیر رکھا اور ظالم ان کے یار ہوئے


چکر دیش ودیش کے کاٹے پھر بھی سفلتا مل نہ سکی
ارتھ ویوستھا کیا سدھرےگی، اہلِ ہنر بےکار ہوئے


ڈیٹا لیا وکیپیڈیا سے اکنومی  سروے میں کہا
ہند کے غرباء کو چھوڑو اب غرباء بے شمار ہوئے


اپنی کمی پر پردہ ڈالا اوروں کے عیب گناتے گئے
جس جس نے آواز اٹھائی دیش کے سب غدار ہوئے


کہتا ہے اتیہاس یہ ہم سے گزرا ہوا کل یاد رکھو
آپس میں جو لڑتے رہے وہ مفتوحِ تاتار ہوئے


نفسی نفسی کے عالم میں حشر بپا ہے سب کے لیے
علماء مشائخ منھ کو چھپائے خواہ مخواہ شرمسار ہوئے


وقت پہ کام جو آئے نہ اس سے بیعت بند کرو
خالی پیر کہلانے والے مرشد ایسے ہزار ہوئے


جنگ پیادے ہی لڑتے ہیں چھوڑو قیادت کا چکر
سونے دو قائد کو چھوڑوتم، ہم تو اب بیدار ہوئے


حال ہمارا دیکھ کے غیروں کو بھی ترس آیا ہم پر
اہلِ قلم نے دیکھا تماشا اہلِ ستم غمخوار ہوئے


کیا گزری اور کیسی گزری کیا کیا لکھے یہ تیرا مبیں
گیت سہانے بھول گئے سب، جانے کیا آزار ہوئے


Ghar Ko Chhoda Gaon Se Bichhde Washat Ke Fankar Huye 
Mazloomon Se Bair Rakha Aur Zalim Unke Yar Huye

Chakkar Desh Videhs Ke Kate Phir Bhi Safalta Mil Na Saki 
ArthVevastha Keya Sudhregi Ahle Hunar Bekar Huye

Data Liya Wikipedia Se Economic Survey Me Kaha 
Hind Ke Ghorba KO Chhodo Ab Ghorba Beshumar Huye 
Apni Kami Par Parda Dala Auron Ke Aib Ginate Gaye
Jis Jis Ne Awaz Uthahi Desh Ke Sab Ghaddar Huye

Kahta Hai Itihas Ye Hamse Guzra Hua Kal Yad Rakho
Apas Me Jo Ladte Rahe Wo Maftooh-e-Tatar Huye

Nafsi Nafsi Ke Alam Me Hshr Bapa Hai Sabke Liye   
Ulma Mashaikh Munh Ko Chupaye Khamkha Sharmsar Huye

Waqt Pe Kam Jo Aaye Na Us se Bai'at Karna Band Karo
Khali Peer Kahlane Wale Murshid Aise Hzar Huye 

Jang Pyade Hi Ladte Hain Chodo Qayadat Ka Chakkar 
Sone Do Qaid Ko Chodo Tum Ham To Ab Bedar Huye

Hal Hamara Dekh Ke Ghairon Ko BHI Taras Aaya Ham Par
Ahle Qalam Ne Dekha Tamasha Ahle Sitam Ghamkhar Huye

Kya Guzri Aur Kaisi Guzri Kya Kya likhe Ye Tera Mobeen
Geet Suhane Bhool Gaye Sab Jane Kya Azar Huye

Voice: AhmadulFattah
Tukbandi & Video: @MobeenJamei
Spacial Thanking to Zaid Munis, Jitendra Kumar and Ajaz Ahmad

Tuesday, February 11, 2020

देश बदला...दिल्ली भी बदल गई #LageRahoKejriwal

दहली दिल्ली मगर #Delhi


'तिहाड़ीचरस' मदिरा के दम पर दिल्ली 2020 का चुनाव शाहीनबाग़ बनाम भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) बनाने की कोशिश की गयी. मीडिया का पेट कमज़ोरों और पिछड़ों के लहू और लाश से भरता है...इस बार पेट भरा तो ज़रूर मगर ज़ायक़ा कुछ अच्छा नहीं रहा. 
ईवीएम का बटन कुछ ज़्यादा ही ज़ोर से दब गया...
आज के #DelhiElectionResults ने साबित कर दिया कि दिल्ली चुनाव शहीनबाग बनाम बीजेपी और हिन्दू बनाम मुस्लिम न था और न ही होना चाहिए.

राम मंदिर के बाद बीजेपी के पास कुछ है ही नहीं इसीलिए वो  #CAA और #NRC और #NPR लायी ताकि 2050 तक हिन्दू-मुस्लिम जारी रहे और सत्ता अपने पास रखी जा सके...उम्मीद है कि अब सुप्रीम कोर्ट में भी जस्टिस #Loya का भूत नहीं आत्मा बसेरा करेगी.

ये भी पढ़ें...'न्यायपालिका' का 'शव' #SupremeCourt http://abirti.blogspot.com/2020/01/supremecourt.html


नागपुर के नाग को...अब तो यारों त्याग दो
आम आदमी पार्टी (आप) की राजनीति राइट, लेफ्ट या सेन्ट्रल में तो कहीं नज़र नहीं आती. भारत में पगडण्डी पर दौड़ कर राजनीति की पनघट तक पहुँचना आसान है मगर पानी भर कर गगरी ला पाना बहुत मुश्किल है इसी मुश्किल में पड़कर आप (केजीरवाल) से ग़लतियां ज़रूर हुई हैं लेकिन इन्हीं ग़लतियों से एक अच्छी बात ये निकल कर आयी कि दिल्ली 2020 का चुनाव गवर्नेंस के नाम रहा. दिल्ली की जनता ने गवर्नेंस को वोट किया न कि ऑडियोलॉजी को. ये अच्छी बात है और इसी अच्छी बात को पूरे भारत में फैलने और फैलाने की ज़रूरत है ताकि हमारी राज्य सरकारें कुछ काम भी करें. सिर्फ हु हल्ला, नारेबाजी और हिन्दू मुस्लिम से काम नहीं चलेगा.

ये भी पढ़ें...#CAAProtests भारतीय नारी आंदोलन http://abirti.blogspot.com/2019/12/caaprotests_24.html


मुख्यमठी बााबा बिष्ट को चाहिए कि वो देसी घी में पनीर की वेज बिरयानी बनवाकर खाएं और गंगा स्नान करें क्योंकि अब उनके ज़हर ने दवा का काम करना शुरू कर दिया है. 
मठ में मठाधीश की अध्यक्ष्ता में मठ्ठे से भरे जाम का दौर चले. चुनाव प्रचार में बाबा का ट्रैक रिकॉर्ड बहुत ख़राब होता जा रहा है. ये जहाँ जहाँ गये बीजेपी वहां वहां झंड हो गयी.


ये भारत के केंद्र प्रशासित राज्य दिल्ली का पहला चुनाव था जिसमे प्रधानमंत्री, गृहयुद्धमंत्री समेत दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के लगभग 250 सांसद और आठ मुख्यमंत्रियों ने चुनाव प्रचार पार्टीहित में किया और रिजल्ट देशहित में गया. 

इस कद्र गंदी और घटिया राजनीति अब तक नहीं की गई थी...सो ये भी हो चली। किसी का जन्म किसी मुल्क में उसकी मर्ज़ी से नहीं होता है।

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना 
हिंदी हैं हम वतन हैं हिन्दोस्ताँ हमारा
सारे जहां से अच्छा..._इक़बाल

ये भी पढ़ें...हम भारत के लोग...http://abirti.blogspot.com/2019/12/blog-post_17.html


सीएम केजरीवाल से उम्मीद की जाती है कि किसी भाषा के प्रति या किसी भी इलाक़े में भेदभाव हरगिज़ देखने को नहीं मिलेगा दुर्भाग्य से जो पिछले पांच सालों में नज़र आया. बधाई हो दिल्ली..बधाई हो केजरीवाल.

@MobeenJamei

Tuesday, February 4, 2020

"देश बदला, अब दिल्ली बदलो" #BJP

कितना अजीब है कि हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जिस में नेतागीरि और उठाईगीरि में कोई  बड़ा फर्क नहीं बचा है  या आगे बढ़ने के लिए क्वालिफिकेशन मात्र हद दर्जा नफरत से भरा होना ही काफी है।

मोदी सरकार इकनॉमिक फ्रंट पर बिल्कुल नाकाम है। वो हमेशा की तरह फिर 'राम राम' करते करते 'रहीममन' के खिलाफ ज़हर का ज्वाला बन चुकी है। कोई उससे ये नहीं पूछता की टैक्स क्लेक्शन कम क्यों हुआ? लाखों करोड़ के टैक्स के पैसों का क्या हुआ? फूड सिक्योरिटी से करीब सत्तर हजार करोड़ कट क्यों किए गए? बजट 2020 में क्या कुछ है?

जिसने अपने प्रदेश में दीवाली से पहले 25 हज़ार होमगार्ड को नौकरी से निकाल दिया, बिजली विभाग को प्राइवेट कर दिया ये और बात कि सरकार ने खुद  ही सबसे ज़्यादा बिजली का बिल नहीं चुकाया और हजारों बिजली कर्मचारी सड़कों पर हैं. लेखपाल भी रोड माप रहे हैं. और हेल्थ की हालत ऐसी है कि भारत माता के हजारों सपूत दुनिया में आते ही मौत की आगोश में पहुंच जाते हैं और उसके माथे पर बल नहीं आता...वही दिल्ली चुनाव के लिए घटिया बिरयानी खा कर प्रचार कर रहा है. BJP अपने सर पर नौकरियों की सबसे बड़ी गठरी ले कर दूसरों से पूछती है कि नौकरियां कहां हैं?...तो ऐसे में "द से दिल्ली द से देश"... पढ़िए विकास सिंह का रैपचक पोस्ट। 
"देश बदला, अब दिल्ली बदलो" #BJP

*विकास सिंह

देश
1-रोज़गार खत्म.
2-शांति खत्म.
3-रेप कंट्री का टैग मिला.
3-एजुकेशनल इंस्टिट्यूट्स में स्टूडेंट्स सड़कों पर आए.
4-उद्योग-धंधे चौपट.
5-महंगाई बढ़ी.
6-आर्मी के नाम पर वोट मांगे, बेसिक नीड्स उन्हीं आर्मी को प्रोवाइड नहीं की गईं.
7-इन्वेस्टर्स इंडिया में इन्वेस्ट करने से डरे.
8- माइनॉरिटीज में डर.
दिल्ली
1-बिलजी-पानी बिल माफ.
2-पब्लिक हेल्थ पर काम .
3-एजुकेशन बजट बढ़ा, स्कूलों के लेवल में सुधार हुआ.
4-मिनिमम सैलरी बढ़ाई.
5-बसों में लेडीज़ के लिए फ्री हुआ सफर.
6-ऑड-ईवन किया ताकि पॉल्युशन लेवल डाउन हो.
7-ऑन ड्यूटी मरने वाले दिल्ली पुलिसकर्मियों को 1 करोड़ रुपये कंपनसेशन.
8- विडो पेंशन मिलने में आसानी.  
द से दिल्ली, द से देश
अंतर आप देख लीजिए, अगर सरस्वती जीभ पर न सही तो थोड़ी दिमाग मे लाइए और वहां भी न सही तो मोबाइल में सरस्वती की इमेज रख लीजिये ताकि आपका मोबाइल कुछ भी फ़ॉरवर्ड करने से पहले .2 नैनो सेकंड की बीप बजा दे.
अब मुद्दे की बात पर आता हूँ, मैंने मुद्दा कहा नीम का गुद्दा नहीं जहां कमल के फूल में निम्बोरी उगती है.
वर्ल्ड की सबसे बड़ी पार्टी BJP ने दिल्ली चुनाव में शिलाजीत पर आश्रित 200 सांसद ,दर्जनों मंत्री कैंपेन में उतारे हैं जिनका एक ही मक़सद है दिल्ली में HM कराना, न न न...आप गलत समझ रहे हैं HM मतलब होटल मैनेजमेंट नहीं बल्कि हिंदू-मुसलमान!!

दिल्ली की 70 सीटों पर ऐसी बंदरबांट मचाई है कि खुद गृहमंत्री अमित शाह गलियों में घूम रहे हैं. हैरानी तब हुई जब गलियों में दिखी भीड़ पर दावे कर रहे हैं कि लोग BJP के साथ हैं, शायद शाह भूल गए कि दिल्ली की गलियों में पचरंगा आचार चखने या श्रीदेवी के राम लड्डू वाले के डमरू पर उनकी भीड़ से ज्यादा लोग जमा हो जाते हैं.
शाहीनबाग़ बोलने वाले विन डीज़ल की खाला के बेटे योगी आदित्यनाथ का रोल Russell Viper (ज़हरीला सांप)  का है. योगी का बस चले तो दिल्ली की गर्मियों में रसना की जगह गौ मूत्र को, गौमुसना के नाम से पिलवाने की अपील करने लगे. इस अपील का भक्तों पर क्या असर हो, ये देखना दिलचस्प होगा.

यह भी पढ़ें...'मुख्यमठी'

BJP के प्रधानमंत्री उफ़...सॉरी, देश के प्रधानमंत्री, वैसे वो इस वक़्त फुल टाइम कैंपेन में जुटे हैं इस वजह से मेरे मुंह से निकल गया. हालांकि मैं अपने शब्दों की कठोर राजनाथ यानी कि कड़ी निंदा करता हूँ. द्वारका की अपनी रैलियों में मोदी के दावों की हक़ीक़त, इसरो की उस उम्मीद की तरह है जो मानती है कि चन्द्रयान 2 से सिग्नल आएगा, और वो काम करना शुरू कर देगा.
BJP के देश से दिल्ली शिफ्ट होने और काम पर वोट की जगह धारा 370, सर्जिकल स्ट्राइक और शाहीनबाग का राग अलापने के मायने समझ लें तो मैं यकीन दिलाता हूं कि दिल्ली चुनाव के बाद, आप "कमल का फूल, मेरी भूल" कहना छोड़ देंगे. BJP किसी एक धर्म विशेष को खतरा होने की बात इसलिए करती है क्योंकि खतरे से खौफ और खौफ से सत्ता मिलती है क्योंकि यहां दर असल खौफ ही राज करता है.

*विकास सिंह वर्किंग जर्नलिस्ट हैं...तारीफ मुझे नहीं आपको करनी है, बताइए ! पोस्ट आपको कैसा लगा?
वैसे भी इत्र बेचते वक़्त खुशबू की तारीफ नहीं की जाती बल्कि खुशबू खुद ही बता देती है..

@MobeenJamei

Sunday, February 2, 2020

' मुहम्मद अली को लीडरी ने तबाह किया' #Jauhar #AliBrothers



  
صاحبو! ایسا کیوں ہے کہ ہمارے یہاں تحریریں پرانی نہیں ہو تیں اور مسائل جوں کے توں رہتے ہیں۔ ’تاکہ پتہ چل سکے کہ علماء مشائخ ناقا بل برداشت ہوچکے ہیں‘ کا تحریری سلسلہ شروع کروں مگر خوف اس بات کا ہے کہ وفور جزبات سے کام لوں گا تو خطا ہوگی۔ بے حد تکلیف دہ ہے کہ بہت سے وہ لوگ جنھیں میں کھونا نہیں چاہتا تھا، کھو چکا ہوں۔ وجہ ندارد ہے کیوں؟ مجھے بخوبی معلوم ہے کہ یہ سلسلہ شروع کرنے سے فائدے کا تو پتہ نہیں لیکن نقصان بہت ہوگا اور یہی خود کشی کے مثل وہ مجرمانہ اور باغیانہ خیال ہے جو ہر کسی کو خاموش رکھتا ہے۔ میں مجبور اور قدرے اشکبار ہوں کیونکہ اب میں اپنوں 
میں بے گانہ اور گھر سے بے گھر ہونے کو تیار ہوں...ع

یقیں محکم عمل پیہم محبت فاتح عالم
جہاد زندگانی میں ہیں یہ مردوں کی شمشیریں _اقبؔال

ایسے نفسیاتی دباؤ  میں کچھ اچھی تحریریں پڑھتا ہوں مگر آج پڑھنے کے ساتھ ٹائپ بھی کر رہا ہوں تاکہ آپ بھی ایک بارغور و خوض کرو کہ ہماری موجودہ قیادت کس قدر کھوکھلی ہے  اور کچھ ہے بھی تو وہ غلطیاں بھی پرانی اور تاریخی کر رہی ہے۔ خیال رہے علم وہ بھی ہے جس میں
قرآن و حدیث کے اقتباس نہیں ہوتے۔

 بابائے اردو مولوی عبدالحق نے معروف مجاہد آزادی محمد علی جوہر پر ایک خاکہ ’چند ہم عصر‘ میں لکھا ہے۔ رامپور میں واقع جوہر یونیورسٹی انھیں کے نام سے منسوب ہے۔

یہ بھی پڑھیں ’آخری فتویٰ‘ https://abirti.blogspot.com/2019/12/blog-post_21.html?m=1


 مولانا محمد علی مرحوم

1933

ہندوستانِ جدید میں جو انگریزی اور مغربی خیالات کا مواد ہے، مولانا محمد علی جوہر مرحوم ’عجیب و غریب‘ شخص ہوئے ہیں۔ وہ مختلف، متضاد اور غیر معمولی اوصاف کا مجموعہ تھے۔ اگر انھیں ایک آتش فشاں پہاڑ یا گلیشیر سے تشبیہ دی جائے تو کچھ زیادہ مبالغہ نہ ہوگا۔ ان دونوں میں عظمت و شان لیکن دونوں میں خطرہ اور تباہی بھی ہے۔


وہ انگریزی کا بہت بڑا ادیب، زبردست انشاء پرداز اور اعلیٰ درجے کا مقرر تھا لیکن جب لکھنے اور بولنے پر آجاتا تو اعتدال اور تناسب دونوں نظروں سے اوجھل ہوجاتے تھے اور انمول جواہر پاروں کے ساتھ کنکر اور روڑے بھی بے تکلف چلے آتے تھے۔ وہ آزادی کا دلدادہ اور جبر و استبداد کا پکَّا دشمن تھا۔ لیکن اگر کبھی اس کے ہاتھ میں اقتدار آتا تو وہ بہت بڑا جابر اور مستبد ہوتا۔ وہ محبت و مروت کا پتلا تھا اور دوستوں پر جاں نثار کرنے کے لیے تیار رہتا تھا‘ لیکن بعض اوقات ذرا سی بات پر اس قدر آگ بگولا ہوجاتا تھا کہ دوستی اور محبت طاق پر دھری رہ جاتی تھی۔ دوست بھی اس کے جاں نثار اور فدائی تھے لیکن اس طرح بچتے تھے جیسے آتش پرست آگ سے بچتا ہے۔ وہ اپنے رفیقوں اورہمکاروں کے ساتھ بڑی شفقت اور عنایت سے پیش آتا تھا اور طرح طرح کے سلوک کرتا تھا۔ لیکن جب بگڑتا تو آپے سے باہر ہو جاتا تھا‘ اس وقت اسے نہ کسی کی عزت و آبرو کا خیال رہتا تھا نہ اپنے کام کا۔ اسی لیے وہ اپنے ہمکاروں سے نباہ نہ سکا اور وہ لوگ جنھیں وہ چن چن کر لایا تھا آخر کار ایک ایک کرکے الگ ہوگئے۔ یوں تو ایک مدت تک وہ عزیز مذہب سے بیگانہ رہا اور جب ادھر جھکا تو ایسا کہ بڑے بڑے جگادھری مولوی اور کٹَّر مُلَّا بھی اس کے سامنے ہیچ تھے۔ وہ جب کبھی کسی کام کو اٹھاتا تو بڑی شان شکوہ سے اٹھاتا اور بڑی بڑی تیاریاں کرتا تھا لیکن تکمیل کو پہنچانا اس کی طبیعت میں ہی نہیں تھا۔ ’کامریڈ‘ کس شان سے نکلا۔ قدر بھی اس کی وہ ہوئی جو شاید ہی کسی اخبار کی ہوئی ہو۔ اپنے پرائے سب اسے سر آنکھوں پر رکھتے تھے لیکن جو اس کاحشر ہوا وہ سب کو معلوم ہے۔ مسلم نیشنل یونیورسٹی (جامعہ ملیہ اسلامیہ) کی بنیادجس زوروشور اورشدومد کے ساتھ ڈالی گئی اس کا حیرت انگیز منظر اب تک ہماری نظروں کے سامنے ہے‘اس وقت قومیت اور آزادی کی کھولن انتہائی نقطے تک پہنچ گئی تھی۔ اسی ہفتے جب یونیورسٹی کے نصاب تعلیم نظم و نسق پر غور کرنے کے لیے ان کے رفقاء کی کمیٹی ہوئی ہے تو وہ سماں ہم کبھی نہیں بھول سکتے’مجذوب کی بڑ‘ بولتے اور سنتے آتے تھے‘ لیکن اس روز اپنے کانوں سُنی اور بڑی عبرت ہوئی۔ ان کے بعض سنجیدہ اور صاحب نظر رفیق جو اس مجلس میں شریک تھے، ششدر و حیران تھے کہ یہ کیا معاملہ ہے اور بے بسی کے ساتھ ایک دوسرے کا منھ تکتے تھے۔ وہ‘ اس وقت اس خیال میں مست تھے (اور انھیں اس کا پورا یقین تھا)کہ کوئی دن جاتا ہے کہ ہندوستان ان کے قدموں کے تلے ہوگا اور اس کی حکومت کی باگ ان کے قوی ہاتھوں میں ہوگی۔ اس خیال سے ان کا اور ان سے زیادہ ان کے برادر بزرگ (شوکت علی) کا دماغ بہک سا گیا تھا اور جو بات اس وقت ان کے منھ سے نکلتی تھی اس میں ایک عجیب مستانہ ادا اور بے تکا پن ہوتا تھا۔ خلافت کا ذکر جتنا کم کیا جائے بہتر ہے۔ اس کا غلغلہ صورِ اسرافیل کی طرح ملک کے ایک سرے سے دوسرے سرے تک پہنچ گیا۔ اور وضیع، شریف، عالم و عامی‘ ہندو اور مسلمان سب ہی اس کی لپیٹ میں آگئے۔  اس میں شک نہیں کہ اس کی وجہ سے حمیت و جوشِ قومی کی لہر سارے ملک میں پھیل گئی تھی لیکن جو انجام ہوا وہ بے کہے سب کو معلوم ہے۔ اب یہ ایک اسم ہے بلا مسمّٰی۔ سانپ نکل گیا مگر ہم ابھی تک لکیر پیٹے جارہے تھے۔ محمد علی مرحوم اس شخصیت اور قابلیت کے آدمی تھے کہ وہ اپنے کاموں کے لیے گھر بیٹھے ہزاروں لاکھوں روپے جمع کر سکتے تھے اور کرتے تھے‘ لیکن وہ اس بے دردی‘ بے پروائی‘اور غیر ذمہ دارانہ طور پر اسے صرف کرتے تھے کہ ان کے کام بھی برباد ہو جاتے تھے۔ ہم میں (خاص کر یوپی والوں اور خصوصاً مسلمانوں میں) اب تک زمیندار کی شان قائم ہے جو بادشاہی شان کی نقل ہے۔ ہم انتظام کرنا اور اعتدال کی شان کو ملحوظ رکھنا بالکل نہیں جانتے‘ ہم صرف ایک ہی بات جانتے ہیں لوٹنا اور لٹانا۔


محمد علی مرحوم ہر اعتبار سے ایک دیو پیکر شخص تھا۔ اس کے رفقاء اور اس کے ہم عصر اس کے سامنے پودنے تھے۔ اور جنھوں نے زندگی کی ہر منزل میں اسے دیکھا اور اس کا ساتھ دیا تھا۔ فرماتے تھے کہ’محمد علی کو لیڈری نے تباہ کیا‘ اس میں مطلق شبہ نہیں کہ وہ اپنے ہم عصروں میں سب سے زیادہ لیڈری کے قابل تھا بشرطیکہ اسے اپنے نفس پر قابوہوتا۔ وہ جس طرح بیماری میں پرہیز پر قابو نہیں رکھتا تھا اسی طرح ہر معاملے میں جوش کے وقت وہ اپنے اختیار سے باہر ہوجاتا۔ 


محمد علی کی زندگی بہت سبق آموز اور نہایت عبرت انگیز ہے۔ اس کو پڑھ کر معلوم ہوتا ہے کہ ہم میں بہتر سے بہتر اور قابل سے قابل شخص بھی ابھی بہت پیچھے ہے۔ ہماری ناکامی کے اسباب خود ہم میں موجود ہیں۔ آج جس شی کے لیے ہم لڑ رہے ہیں‘ ایسا معلوم ہوتا ہے کہ شاید ہم اس کے قابل نہیں۔ ہم جب اپنے نفسوں کا جائزہ لیتے ہیں تو یہ معلوم ہوتا ہے کہ ہماری سیرتیں خام، ہماری طبعیتیں ناتربیت یافتہ اور ہمارے نفس چور ہیں۔ ہمیں ابھی بہت سی ٹھوکروں اور بہت کچھ تربیت کی ضرورت ہے۔ جس چیز کی ہم خواہش کر رہے ہیں، اس کے لیے پختہ سیرت اور اعتدالِ طبع کی ضرورت ہے اور وہ ابھی ہم سے کوسوں دور ہے۔

دور حیات آئے گا قاتل قضا کے بعد
ہے ابتدا ہماری تری انتہا کے بعد
قتل حسین اصل میں مرگ یزید ہے
اسلام زندہ ہوتا ہے ہر کربلا کے بعد_جوہر

یہ بھی پڑھیں سورۂ رحمن کا منظوم ترجمہ https://abirti.blogspot.com/2020/04/surah-ar-rahman-translation-in-urdu.html


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' मुहम्मद अली को लीडरी ने तबाह किया'

जानिए! क्यों?

साहिबो! ऐसा क्यों है कि हमारे यहां तहरीरें पुरानी नहीं होतीं और मसाइल जूं के तूं रहते हैं। 'ताकि पता चल सके कि उल्मा मशाइख़ नाक़ाबिले  बर्दाश्त हो चुके हैं' का तहरीरी सिलसिला शुरू करूँ मगर ख़ौफ़ इस बात का है कि वफ़ूरे जज़बात से काम लूँगा तो ख़ता होगी। बेहद तकलीफ़-दह है कि बहुत से वो लोग जिन्हें मैं खोना नहीं चाहता था, खो चुका हूँ। वजह नदारद है क्यों? मुझे बख़ूबी मालूम है कि ये सिलसिला शुरू करने से फ़ायदे का तो पता नहीं लेकिन नुक़्सान बहुत होगा और यही ख़ुदकुशी के मिसल रस्म वो मुजरिमाना और बाग़ियाना ख़्याल है जो हर किसी को ख़ामोश रखता है। मैं मजबूर और क़दरे अश्कबार हूँ क्योंकि अब मैं अपनों में बेगाना और घर से बे-घर होने को तैयार हूँ।

यक़ीं मुहकम अमल पैहम मुहब्बत फ़ातेह-ए-आलम 
जिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरें_इक़बाल

ऐसे नफ़सियाती (ज़हनी) दबाव में कुछ अच्छी तहरीरें पढ़ता हूँ मगर आज पढ़ने के साथ टाइप भी कर रहा हूँ ताकि आप भी एक-बार सोच विचार करो कि हमारी मौजूदा लीडरशिप किस क़दर खोखली है और कुछ है भी तो वो गलतियां भी पुरानी और तारीख़ी कर रही है। ख़्याल रहे इल्म वो भी है जिसमें क़ुरआन-व-हदीस के इक़तिबास (कोटेशन) नहीं होते।
बाबा ए उर्दू मौलवी अबदुलहक़ ने मारूफ़ मुजाहिद ए आज़ादी मुहम्मद अली जौहर पर एक ख़ाका 'चंद हमअसर' में लिखा है। रामपूर स्तिथ जौहर यूनीवर्सिटी उन्हीं के नाम पर है।

मौलाना मुहम्मद अली मरहूम
1933


हिंदूस्तान-ए-जदीद में जो अंग्रेज़ी और मग़रिबी (पश्चिमी) ख़्यालात का मवाद (कंटेंट) है, मौलाना मुहम्मद अली जौहर मरहूम 'अजीब-ओ-ग़रीब शख़्स हुए हैं। वो मुख़्तलिफ़, मुतज़ाद (कंट्राडिक्शन, विरोधाभास) और ग़ैरमामूली औसाफ़ (खूबियों) का मजमूआ थे। अगर उन्हें एक आतिश-फ़िशाँ (ज्वाला) पहाड़ या ग्लेशियर से तशबीह (मिसाल) दी जाये तो कुछ ज़्यादा मुबालग़ा (बढ़ा कर बताना) न होगा। इन दोनों में अज़मत-ओ-शान लेकिन दोनों में ख़तरा और तबाही भी है।


वो अंग्रेज़ी का बहुत बड़ा अदीब (साहित्यिक), ज़बरदस्त इंशा-ए-पर्दाज़ (लिखाड़ी) और आला दर्जे का मुकर्रिर (वक्ता) था लेकिन जब लिखने और बोलने पर आ जाता तो एतिदाल (बैलेंस) और तनासुब दोनों नज़रों से ओझल हो जाते थे और अनमोल जवाहर पारों के साथ कंकर और रोड़े भी बे-तकल्लुफ़ चले आते थे। वो आज़ादी का दिलदादा और जबर-ओ-इस्तिबदाद (ज़ुल्म) का पक्का दुश्मन था। लेकिन अगर कभी उस के हाथ में इक़तिदार (गवर्नमेंट) आता तो वो बहुत बड़ा जाबिर और मुस्तबिद (ज़ालिम) होता। वो मुहब्बत-ओ-मुरव्वत का पुतला था और दोस्तों पर जां निसार करने के लिए तैयार रहता था लेकिन बाज़-औक़ात (कभी कभी) ज़रा सी बात पर इस क़दर आग बगूला हो जाता था कि दोस्ती और मुहब्बत ताक़ पर धरी रह जाती थी। दोस्त भी उस के जां निसार और फ़िदाई थे लेकिन इस तरह बचते थे जैसे आतश परस्त (पारसी) आग से बचता है। वो अपने रफ़ीक़ों और हमकारों (साथ काम करने वालों) के साथ बड़ी शफ़क़त और इनायत से पेश आता था और तरह तरह के सुलूक करता था। लेकिन जब बिगड़ता तो आपे से बाहर हो जाता था उस वक़्त उसे ना किसी की इज़्ज़त-ओ-आबरू का ख़्याल रहता था ना अपने काम का। इसी लिए वो अपने हमकारों (साथ काम करने वालों) से निबाह न सका और वो लोग जिन्हें वो चुन-चुन कर लाया था आख़िरकार एक एक करके अलग हो गए। यूं तो एक मुद्दत तक वो अज़ीज़ मज़हब (इस्लाम) से बेगाना रहा और जब उधर झुका तो ऐसा कि बड़े बड़े जोगाधरी मौलवी और कट्टर मुल्ला भी उसके सामने हेच थे। वो जब कभी किसी काम को उठाता तो बड़ी शान शिकोह से उठाता और बड़ी बड़ी तैयारीयां करता था लेकिन तकमील  को पहुंचाना उस की तबीयत में ही नहीं था। 'कामरेड' (अंग्रेज़ी अखबार) किस शान से निकला। क़दर भी उसकी वो हुई जो शायद ही किसी अख़बार की हुई हो। अपने पराए सब उसे सर आँखों पर रखते थे लेकिन जो उसका हश्र हुआ वो सबको मालूम है। मुस्लिम नेशनल यूनीवर्सिटी (जामिआ मिल्लिया इस्लामीया) की बुनियाद जिस ज़ोर-ओ-शोर और शद-ओ-मद के साथ डाली गई उस का हैरत-अंगेज़ मंज़र अब तक हमारी नज़रों के सामने है' उस वक़्त क़ौमियत (राष्ट्रवाद) और आज़ादी की खौलान इंतिहाई नुक़्ते तक पहुंच गई थी। इसी हफ़्ते जब यूनीवर्सिटी के निसाब ए तालीम (सिलेबस) नज़म-ओ-नसक़ (एडमिनिस्ट्रेशन) पर ग़ौर करने के लिए उनके रोफ़क़ा (साथियों) की कमेटी हुई है तो वो समां हम कभी नहीं भूल सकते 'मजज़ूब (जिसे होश न हो) की बड़' बोलते और सुनते आते थे लेकिन उस रोज़ अपने कानों सुनी और बड़ी इबरत हुई (सीख मिली)। उनके बाज़ (कुछ) संजीदा और साहिब-ए-नज़र (सूझ बूझ वाले) रफ़ीक़ जो इस मजलिस में शरीक थे, शश्दर-ओ-हैरान थे कि ये क्या मामला है और बेबसी के साथ एक दूसरे का मुँह तकते थे। वो उस वक़्त इस ख़्याल में मस्त थे (और उन्हें इसका पूरा यक़ीन था) कि कोई दिन जाता है कि हिन्दोस्तान उनके क़दमों के तले होगा और इस की हुकूमत की बाग उनके क़वी (मज़बूत) हाथों में होगी। इस ख़्याल से उनका और उनसे ज़्यादा उनके बिरादर ए बुज़ुर्ग (शौकत अली) का दिमाग़ बहक सा गया था और जो बात उस वक़्त उनके मुँह से निकलती थी ,उस में एक अजीब मस्ताना अदा और बे-तुका पन होता था। ख़िलाफ़त का ज़िक्र जितना कम किया जाये बेहतर है। इस का ग़लग़ला सूरे (संख) इसराफ़ील की तरह मुल्क के एक सिरे से दूसरे सिरे तक पहुंच गया। और वज़ीअ, शरीफ़, आलम-ओ-आमी हिंदू और मुस्लमान सब ही उस की लपेट में आ गए। इस में शक नहीं कि इस की वजह से हमीयत-ओ-जोश-ए-क़ौमी की लहर सारे मुल्क में फैल गई थी लेकिन जो अंजाम हुआ वो बे-कहे सबको मालूम है। अब ये एक इस्म (नाम) है बिला मुसम्मा (वस्तु)। साँप निकल गया मगर हम अभी तक लकीर पीटे जा रहे थे। 


मुहम्मद अली मरहूम इस शख़्सियत और क़ाबिलीयत के आदमी थे कि वो अपने कामों के लिए घर बैठे हज़ारों लाखों रुपय जमा कर सकते थे और करते थे लेकिन वो इस बेदर्दी' बेपर्वाई'और ग़ैर ज़िम्मा दाराना तौर पर उसे सर्फ (खर्च) करते थे कि उनके काम भी बर्बाद हो जाते थे। हम में (ख़ासकर यूपी वालों और ख़ुसूसन मुस्लमानों में) अब तक ज़मींदार की शान क़ायम है जो बादशाही शान की नक़ल है। हम इंतिज़ाम करना और एतिदाल (बैलेंस) की शान को मलहूज़ रखना बिलकुल नहीं जानते, हम सिर्फ एक ही बात जानते हैं लूटना और लुटाना।


मुहम्मद अली मरहूम हर एतबार से एक देव पैकर शख़्स था। उसके रोफ़क़ा और उसके हमअसर (ज़माने वाले) उस के सामने पोदनते (उगते हुए पौदे की तरह) थे। और जिन्होंने ज़िंदगी की हर मंज़िल में उसे देखा और उस का साथ दिया था। फ़रमाते थे कि 'मुहम्मद अली को लीडरी ने तबाह किया।' इस में मुतलक़ शुबहा (शक) नहीं कि वो अपने हम-असरों (ज़माने वालों) में सबसे ज़्यादा लीडरी के काबिल था बशर्ते कि उसे अपने नफ़स (आप) पर क़ाबू होता। वो जिस तरह बीमारी में परहेज़ पर क़ाबू नहीं रखता था उसी तरह हर मामले में जोश के वक़्त वो अपने इख़तियार से बाहर हो जाता था


मुहम्मद अली की ज़िंदगी बहुत सबक़ आमोज़ और निहायत इबरत-अंगेज़ है। उसको पढ़ कर मालूम होता है कि हम में बेहतर से बेहतर और काबिल से काबिल शख़्स भी अभी बहुत पीछे है। हमारी नाकामी के अस्बाब (कारण) ख़ुद हम में मौजूद हैं। आज जिस शै (चीज़) के लिए हम लड़ रहे हैं ऐसा मालूम होता है कि शायद हम उसके काबिल नहीं। हम जब अपने नफ़सों का जायज़ा लेते हैं तो ये मालूम होता है कि हमारी सीरतें (आदतें) ख़ाम (कच्ची), हमारी तबईतें (मिज़ाज, मन) न तरबियत याफता और हमारे नफ़स चोर हैं। हमें अभी बहुत सी ठोकरों और बहुत कुछ तरबियत की ज़रूरत है। जिस चीज़ की हम ख़ाहिश (चाहत) कर रहे हैं, उस के लिए पुख़्ता सीरत और एतिदाल-ए-तबा (बैलेंसिव मिज़ाज) की ज़रूरत है और वो अभी हम से कोसों दूर है। 

दौरे हयात आएगा दौरे कज़ा के बाद 
है इबतेदा हमारी तेरी इंतेहा के बाद 
कतले हुसैन असल में मर्गे यजीद है 
इस्लाम जिंदा होता है हर कर्बला के बाद_जौहर

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Saturday, February 1, 2020

सोशलिस्तान और #Budget2020

ये वो टिप्पणियां हैं जो हरगिज़ नजर अंदाज नहीं की जा सकतीं।


वैसे भी अकलीमा हसन ने कल सुबह ही स्टेटस लगा लिया था,' गरीबों के अर्थशास्त्रियों की टिप्पणियों का इंतजार है'... सो पेशे खिदमत है.

Garvit Garg

Indian government cuts food subsidy by 68650 crores, from 1.84 lakh crore 2019-20 Budget Estimate to 1.08 lakh crore Revised Estimate in 2019-20 to 1.15 lakh crore in 2020-21 Budget Estimate.

मतलब ये कि सरकार ने खाद्य सब्सिडी के  बजट 1.84 लाख करोड़ में से 68650 करोड़ की कटौती कर दी है.'देश के गरीबों को, भूखे मारो... को'

इकोनॉमिक सर्वे 2020 में सुझाव है कि इस देश की  20% सबसे गरीब जनता की फ़ूड सिक्योरिटी बंद कर देनी चाहिए। एक ऐसे वक़्त में जब इस देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का भट्टा बैठा हुआ है, तब यह सब सुझाव आ रहे हैं। सही भी है, 'देश के गरीबों को, भूखे मारो...को।

70 exemptions in Income Tax removed which encouraged people to invest:
-No investment in mutual funds
-No new share market investment for middle class
-No new insurance policies
Result: Market adversely affected in middle of an economic slowdown.

इनकम टैक्स में सत्तर छूटें वापस ली गईं जो जनता (आप) को निवेश करने हेतु प्रोत्साहित करेंगी.
म्यूच्यूअल फंड्स में कोई निवेश नहीं।
मिडिल क्लास के लिए कोई नया शेयर मार्केट निवेश नहीं.
कोई नया इंशोरेंस पॉलिसी नहीं.
नतीजा: आर्थिक मंदी के बीच बाजार पर प्रतिकूल (नकारात्मक, Negative) असर पड़ा. 

(शेयर मार्केट बुरी तरह गिरता चला गया और कई वर्षों के रिकॉर्ड टूट गए.)

Murari Tirpathi

जैसे सरकार ने गरीबों की संख्या घटा दी वैसे ही जीडीपी ग्रोथ रेट बढ़ाने का भी इंतजाम कर लिया है.
2015 में सरकार ने जीडीपी कैलकुलेशन का नया तरीका निकाला था. इससे अचानक से जीडीपी बढ़ने लगी. 


कल सरकार ने वित्त वर्ष 2018-19 की जीडीपी ग्रोथ रेट 6.8 प्रतिशत से घटाकर 6.1 प्रतिशत कर दी.
ऐसा क्यों?
ऐसा इसलिए कि हर वित्त वर्ष की जीडीपी वृद्धि दर पिछले वर्ष के आधार पर नापी जाती है. अब अगर 2018-19 की जीडीपी ग्रोथ रेट घटा दी जाए तो 2019-20 की कम जीडीपी ग्रोथ रेट भी ज्यादा हो जाएगी.
2019-20 की जिस जीडीपी ग्रोथ के 4.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है, वो अब सीधे 5.7 प्रतिशत हो जाएगी क्योंकि सरकार ने इससे पहले के वित्त वर्ष की जीडीपी ग्रोथ रेट घटाकर कम कर दी है.
बिल्कुल वही बात कि मेरी लाइन छोटी है, तो पहले जो बड़ी लाइन थी उसका और छोटा कर देंगे. मेरी लाइन अपने आप बड़ी दिखने लगेगी.

सरकार ने गरीबों की संख्या कम दिखाने के लिए तेंदुलकर कमेटी द्वारा निर्धारित गरीबी रेखा का हवाला दिया. जबकि इसी सरकार ने नई गरीबी रेखा निर्धारित करने के लिए 2014 में रंगराजन कमेटी का गठन किया था. 


तेंदुलकर कमेटी ने जो गरीबी रेखा तय की थी वो ग्रामीण इलाकों के लिए प्रतिदिन 27 रुपये और शहरी इलाकों के लिए प्रतिदिन 33 रुपये थी. रंगराजन कमेटी ने इसे बढ़ाकर क्रमश: 32 रुपये और 47 रुपये कर दिया था.
रंगराजन कमेटी के हिसाब से अगर अभी गरीबों का निर्धारण होता तो करीब 3 से चार करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे चले जाते. तो सरकार ने कहा कि हम तेंदुलकर कमेटी से ही इसकी गणना करेंगे. हमारे रामराज्य में गरीब बढ़ ही नहीं सकते हैं.

गरीबी नहीं गरीबों को ही हटाओ...

Shuja'at Qaudiri
National President of Muslim Students Organisation (#MSO)

#बजट2020 मे भविष्य के लिए कोई सटीक नीति और रोड मैप नहीं दिखाई देता है, शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य जैसे अहम सेक्टर को निराशा हुई है।
कुल मिलाकर #NirmalaSitharaman ने "तेज़ हवा मे धुआं के सहारे महल" बनाने की कोशिश की है।


#Budget2020 ने ये साबित कर दिया है कि सरकार की मंशा Neo Liberalism और Neo Imperialism को बढ़ावा देकर देश को आर्थिक गुलामी की तरफ धकेलना है।
#LIC को बेचने के फैसले से सरकार पर आम जन का विश्वास उठ जाएगा।

Jeetu Ji

कृषि और सहायक गतिविधियों के साथ-साथ समूची ग्रामीण अर्थव्यवस्था की हालत खराब होने के बावजूद इस बजट में मनरेगा को मिलने वाले फंड में कटौती की गई है। जबकि ग्रामीण आय को बढ़ाने का यह सबसे अच्छा जरिया है।

चूंकि मुझे इकनॉमी की समझ नहीं है मगर फिर भी कहना चाहता हूं कि विकिपीडिया के डाटा के सहारे जब मोदीनोमिक्स की जगह थालीनोमिक्स ही चलानी थी तो इतनी चुल मचाने की क्या ज़रूरत थी!

डरो मत, तुम्हें कोई गद्दार नहीं कहेगा, तुम्हें कोई गोली नहीं मारेगा।

@MobeenJamei